यात्रा-संस्मरण डी. एस. नेगी, साकेत, नई दिल्ली ,महादेव का बुलावा।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
कहते हैं, जब तक महादेव का बुलावा न आए, तब तक काशी विश्वनाथ के दर्शन सहज नहीं होते। कई वर्षों से मन में एक तीव्र इच्छा थी कि एक बार काशी जाकर बाबा विश्वनाथ के दर्शन करूँ, किंतु हर बार किसी-न-किसी कारण से यात्रा टलती रही। मन की यह अभिलाषा धीरे-धीरे प्रतीक्षा में बदलती जा रही थी। इस बार न जाने क्यों ऐसा लगा, जैसे स्वयं महादेव ने बुलावा भेज दिया हो। काशी विश्वनाथ की कृपा हुई और अंततः तीन अक्टूबर 2026 को दिल्ली से वाराणसी जाने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस में तत्काल टिकट भी मिल गया।दर्शन की यह मेरी पहली यात्रा थी। इसलिए मन में उत्साह के साथ-साथ एक अनजानी श्रद्धा और भीतर तक उतरती हुई अधीरता भी थी। पाँच अक्टूबर की प्रातः लगभग साढ़े चार बजे दक्षिणी दिल्ली स्थित अपने निवास से ओला टैक्सी द्वारा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए प्रस्थान किया।सुबह का समय था। सड़कें लगभग खाली थीं और दिल्ली अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी। रास्ता साफ मिला, इसलिए लगभग पच्चीस मिनट में कमला मार्केट तक पहुँच गए। इसके बाद नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के आसपास यातायात कुछ अधिक बढ़ गया। वहाँ जाम में लगभग पैंतीस मिनट लग गए। घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ रही थीं और मन में एक हल्की-सी चिंता भी थी कि कहीं ट्रेन छूट न जाए।जब स्टेशन पहुँचे तो वंदे भारत एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नंबर 16 पर खड़ी थी। ट्रेन को देखते ही मन को जैसे राहत मिली। यात्रा की उत्सुकता और बाबा विश्वनाथ के प्रथम दर्शन की लालसा मन में लिए हम अपनी सीट पर जाकर बैठ गए। ट्रेन के प्रस्थान का निर्धारित समय सुबह छह बजे था।कुछ ही देर बाद सीटी की आवाज सुनाई दी और वंदे भारत धीरे-धीरे अपने स्थान से चल पड़ी। दिल्ली पीछे छूटने लगी और उसके साथ ही मन में एक अलग ही शांति उतरती चली गई। ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे यह केवल एक रेलयात्रा नहीं, बल्कि महादेव के दरबार तक पहुँचने की यात्रा हो।जैसे-जैसे ट्रेन आगे बढ़ती गई, बाहर के दृश्य बदलते गए और भीतर की भावनाएँ भी एक नए रंग में ढलती गईं। गाजियाबाद पहुँचने तक पानी की बोतल और जलपान की व्यवस्था हो गई। ट्रेन अपनी निर्धारित गति से आगे बढ़ती रही और यात्रियों की सुविधा के लिए समय-समय पर खान-पान की सामग्री भी मिलती रही।यात्रा के दौरान मन बार-बार काशी की कल्पना में खो जाता। कभी बाबा विश्वनाथ का मंदिर आँखों के सामने उभर आता, तो कभी मन में यह विचार आता कि जिस दर्शन की इच्छा इतने वर्षों से हृदय में संजोए हुए हूँ, वह क्षण आखिर कैसा होगा।दोपहर होते-होते ट्रेन प्रयागराज स्टेशन पहुँची। वहाँ दिन के भोजन की व्यवस्था भी होने लगी। यात्रा सुचारु रूप से चल रही थी और ट्रेन अपने निर्धारित समय के अनुसार आगे बढ़ रही थी। खिड़की के बाहर तेजी से पीछे छूटते हुए दृश्य और भीतर उमड़ती श्रद्धा—दोनों मिलकर इस यात्रा को मेरे लिए विशेष बना रहे थे।समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। अब काशी दूर नहीं थी। मन की बेचैनी बढ़ने लगी थी। ऐसा लग रहा था, जैसे कोई अदृश्य शक्ति मुझे अपनी ओर खींच रही हो। वर्षों से जिस क्षण की प्रतीक्षा थी, वह अब धीरे-धीरे निकट आ रहा था।अंततः वह प्रतीक्षित समय भी आ गया। लगभग दो बजे वंदे भारत काशी पहुँची। जैसे ही वाराणसी की धरती पर कदम रखा, मन में एक गहरी अनुभूति हुई। लगा, जैसे वर्षों से जिस बुलावे की प्रतीक्षा थी, वह आज पूर्ण हो गया है।यह केवल दिल्ली से वाराणसी तक की यात्रा नहीं थी। मेरे लिए यह एक ऐसी यात्रा थी, जिसकी दिशा मैंने नहीं, बल्कि स्वयं महादेव ने निर्धारित की थी।सफर अच्छा रहा था, लेकिन यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव अभी सामने था—काशी विश्वनाथ के दर्शन।मन में केवल एक ही भाव था—मन में यही भाव लिए स्टेशन से बाहर निकला। अब होटल पहुँचना था। समय को देखते हुए तुरंत ओला या रैपिडो बुक करने की कोशिश की। एक के बाद एक कई बुकिंग कीं, लेकिन हर बार ड्राइवर की ओर से यात्रा रद्द कर दी जाती। होटल स्टेशन से मुश्किल से दो-तीन किलोमीटर की दूरी पर था, फिर भी कोई ऑटो-रिक्शा चालक तीन सौ-चार सौ रुपये से नीचे चलने को तैयार नहीं था।समय बीतता जा रहा था। कुछ ही दूरी के रास्ते के लिए इतनी अधिक राशि माँगी जा रही थी कि मन खिन्न हो उठा। देखते-देखते लगभग एक घंटा स्टेशन पर ही बीत गया। काशी पहुँचने की खुशी के बीच यह छोटी-सी परेशानी अनावश्यक रूप से मन को विचलित कर रही थी।आखिरकार कुछ देर बाद एक ओला चालक ने हमारी बुकिंग स्वीकार कर ली। राहत की साँस ली और सामान लेकर गाड़ी में बैठ गए। कुछ ही समय में होटल पहुँच गए, लेकिन तब तक घड़ी की सुइयाँ साढ़े तीन बजा चुकी थीं।होटल पहुँचकर सबसे पहले सामान कमरे में रखा। मन में विश्राम करने का विचार तक नहीं आया। वर्षों से जिस क्षण की प्रतीक्षा थी, वह सामने था—बाबा विश्वनाथ के दर्शन का क्षण। इसलिए थोड़ी देर भी गँवाना उचित नहीं लगा।हम तुरंत काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर चल पड़े। रास्ते में काशी की गलियाँ, उनका वातावरण और लोगों की चहल-पहल मन को अपनी ओर खींच रही थी। हर कदम के साथ भीतर की श्रद्धा और बढ़ती जा रही थी।लेकिन मंदिर के निकट पहुँचते-पहुँचते शाम के लगभग साढ़े पाँच बज चुके थे। सामने श्रद्धालुओं की लंबी कतार दिखाई दी। कतार इतनी लंबी थी कि उसे देखकर अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि दर्शन के लिए कम-से-कम तीन-चार घंटे लग सकते हैं।हम कुछ क्षण वहीं खड़े होकर उस विशाल कतार को देखते रहे। मन में एक ओर बाबा के दर्शन की तीव्र इच्छा थी, तो दूसरी ओर समय बीतने की चिंता भी।तभी पास की एक दुकान पर बैठे सज्जन ने हमारी परेशानी भाँप ली। उन्होंने सहज भाव से कहा—“कब तक लाइन में लगे रहोगे? बहुत समय लग जाएगा।”उनकी बात सुनकर हम कुछ क्षण के लिए ठिठक गए। सामने श्रद्धालुओं की अंतहीन कतार थी और पीछे बीतता हुआ दिन। मन में प्रश्न उठने लगा—क्या आज बाबा के दर्शन हो पाएँगे, या इस विशाल भीड़ के कारण फिर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी?काशी की उस संध्या में, गंगा की नगरी की गलियों के बीच, मन में एक ही विश्वास बना हुआ था—जिस बाबा ने बुलाया है, वे दर्शन भी अवश्य कराएँगे।दुकान वाले सज्जन की बात अंततः मान लेनी पड़ी। उन्होंने हमें सलाह दी कि सामान उनके पास बने लॉकर में सुरक्षित रख दें और पूजा के लिए फूलों से सजी तैयार टोकरी भी वहीं से ले लें। उनके पास पूजा कराने के लिए एक पंडित जी भी बैठे हुए थे। उन्होंने कहा—“आप चिंता मत कीजिए। दर्शन भी मैं करवा दूँगा और पूजा-पाठ भी करा दूँगा।”फिर क्या था! मन में यही भाव आया—बाबा ने बुलाया है, तो यह भी उनकी ही इच्छा होगी। हमने उनके पास सामान का लॉकर लिया और पूजा के लिए फूलों से सजी टोकरी भी ले ली।पंडित जी हमें काशी की घुमावदार और सँकरी गलियों से होते हुए आगे ले गए। कुछ दूर चलने के बाद उन्होंने हमें दर्शन के लिए कतार में लगा दिया। मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं की इतनी भीड़ थी कि आगे बढ़ना भी कठिन हो रहा था। धक्का-मुक्की के बीच किसी तरह हम आगे बढ़ते रहे।भीड़ में बच्चों को नीचे लगी लोहे की स्टील-जाली से चोट भी लग गई और मेरे घुटने में भी चोट लगी। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि उस समय दर्द का अनुभव तक नहीं हुआ। मन पूरी तरह बाबा के दर्शन में लगा था। ऐसा लग रहा था जैसे महादेव की कृपा ने सारी पीड़ा को अपने भीतर समेट लिया हो।अंततः वह क्षण भी आया, जिसका वर्षों से इंतजार था। बाबा विश्वनाथ के दर्शन हो गए।उनके सम्मुख खड़े होते ही मन में एक अद्भुत शांति उतर आई। भीड़, थकान, रास्ते की कठिनाइयाँ और चोट—सब कुछ जैसे उस क्षण पीछे छूट गया। आँखों के सामने केवल बाबा का स्वरूप था और हृदय में यही भाव उठ रहा था कि सचमुच यह दर्शन महादेव के बुलावे से ही संभव हुआ है।दर्शन और पूजा के बाद जब हम बाहर दुकान पर पहुँचे तो पंडित जी भी वहीं आ गए। उन्होंने कहा—“आप पाँच लोग हैं। प्रत्येक के पाँच सौ रुपये होंगे।”हमने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि यह राशि कुछ अधिक है, लेकिन वे अपनी बात पर अड़े रहे। अंततः पाँचों के लिए पाँच-पाँच सौ रुपये देने पड़े। उन्होंने यह भी कहा कि भुगतान केवल नकद होगा, यूपीआई से नहीं।मन में थोड़ा खिन्नता हुई, लेकिन अगले ही क्षण लगा—देना तो है ही। बाबा के दर्शन हो गए, इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है!हमने राशि दे दी और आगे की यात्रा के लिए निकल पड़े।अब हमारा अगला पड़ाव था—अस्सी घाट की आरती।हम अस्सी घाट पहुँचे तो वहाँ नाव में बैठकर आरती देखने के लिए कहा गया। प्रत्येक व्यक्ति से लगभग चार सौ रुपये लेकर नाव में बैठाया गया। नाव गंगा की धारा में आगे बढ़ी और कुछ ही देर में घाट का दृश्य सामने था। धीरे-धीरे संध्या गहराने लगी थी। गंगा के किनारे आरती की तैयारियाँ हो रही थीं और वातावरण में भक्ति का भाव घुलता जा रहा था।आरती के दर्शन का अपना ही आनंद था। दीपों की रोशनी, मंत्रोच्चार और गंगा की शांत धारा—उस समय काशी सचमुच किसी अलौकिक लोक जैसी प्रतीत हो रही थी।रात होने लगी थी। साथ आए लोगों ने कहा कि काशी की प्रसिद्ध चाट भी खानी चाहिए। काशी की चाट का नाम सुनते ही सबका मन ललचा उठा। किसी तरह वहाँ पहुँचे, लेकिन चाट की दुकान पर भी श्रद्धालुओं और ग्राहकों की इतनी लंबी कतार थी कि देखकर लगा जैसे बाबा के दर्शन से भी बड़ी लाइन यहाँ लगी हुई है!हमने उस कतार को देखकर चाट खाने का विचार छोड़ दिया और सीधे होटल लौट आए। रात का भोजन किया और अगले दिन प्रातः अस्सी घाट की आरती देखने की तैयारी करने लगे।अगली सुबह हम प्रातःकाल ऑटो-रिक्शा बुक करके अस्सी घाट पहुँचे। लगभग साढ़े चार बजे का समय था। सुबह की शांति में घाट का वातावरण पिछली शाम की तुलना में बिल्कुल अलग लग रहा था। भीड़ भी अपेक्षाकृत कम थी। हमें लगभग तीन-तीन सौ रुपये में बैठने की जगह मिल गई।कुछ ही देर बाद प्रातःकालीन आरती आरंभ हुई। सूर्योदय से पहले का वह शांत वातावरण, गंगा की धारा और आरती की आध्यात्मिक ध्वनि—मन को भीतर तक छू रही थी। लगा, काशी में सुबह भी किसी प्रार्थना की तरह होती है।आरती के बाद हम शहर की ओर लौटे। सुबह का नाश्ता करने के लिए प्रसिद्ध पूरी-कचौड़ी की दुकान पर पहुँचे। सभी ने एक-एक थाली ली। गरमागरम पूरी-कचौड़ी का स्वाद यात्रा की थकान के बीच बहुत अच्छा लगा।इसके बाद हमारा अगला पड़ाव था—काल भैरव मंदिर।काल भैरव के दर्शन के लिए भी हमें काशी की उन्हीं सँकरी और घुमावदार गलियों से होकर गुजरना पड़ा, जिनमें एक साथ कई तरह की आवाजें, दुकानें और श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई देती थी। मंदिर के बाहर एक दुकान पर जूते-चप्पल उतारे और फिर पूजा के लिए फूलों की एक टोकरी ली। एक टोकरी के दो सौ रुपये दिए गए।इसके बाद अंदर पंडित जी ने चढ़ावे के लिए ढाई हजार रुपये माँगे। टोकरी में फूलों के साथ काले धागे और कुछ अन्य पूजन-सामग्री रखी हुई थी, जिसे काल भैरव जी के समीप चढ़ाया जाना था।मैंने जैसे ही टोकरी देखी, तभी पंडित जी ने ऊँची आवाज में कहा—“दक्षिणा कहाँ है?”मैं जेब से कुछ नोट निकालने ही वाला था कि इससे पहले ही पंडित जी ने पूजा की टोकरी उठाकर एक ओर फेंक दी। द्वारपाल ने भी धक्का देकर हमें बाहर की ओर कर दिया।क्षणभर के लिए मैं स्तब्ध रह गया। समझ नहीं आया कि इस व्यवहार पर क्या प्रतिक्रिया दूँ। किसी तरह उन सँकरी गलियों से बाहर निकला। मन में एक ही विचार था—शायद यह भी काशी की परीक्षा है।लेकिन फिर भीतर से वही विश्वास जागा—“बाबा की ही कृपा है कि उनके दर्शन हो गए। मैं काशी तक आ तो गया।”मन में यह भी विचार आया कि इस छोटी-सी यात्रा में मुझे काशी को समझने के लिए बहुत कुछ मिल गया था। यहाँ श्रद्धा भी थी, आस्था भी थी, भीड़ भी थी, कठिनाइयाँ भी थीं और लोगों के अलग-अलग रूप भी।अपनों से मिलनकाशी विश्वनाथ के दर्शन की इस यात्रा में बाबा की कृपा से एक और मनोकामना पूरी हो गई। काशी दर्शन के साथ-साथ चार अक्टूबर की सुबह अपने गुरुजी के निवास-स्थान, बीएचयू, जाने का अवसर भी मिला।काफी समय से मन में अपने पूजनीय बड़े भाई, भाभी और नानी माँ से मिलने की इच्छा थी। जीवन की व्यस्तताओं के कारण उनसे लंबे समय से मुलाकात नहीं हो पाई थी। इस यात्रा में बाबा ने वह अवसर भी प्रदान कर दिया।सुबह बीएचयू पहुँचकर जब अपनों से मिला तो मन को एक अलग ही सुख और शांति का अनुभव हुआ। लंबे समय बाद प्रियजनों को सामने देखकर लगा, जैसे समय कुछ क्षणों के लिए ठहर गया हो। सबके साथ बैठकर बातें की, पुराने प्रसंग याद किए और परिवार के बीच बीता हुआ समय मन को बहुत अच्छा लगा।दिन भर वहीं रहा। साथ बैठकर भोजन किया, जलपान किया और परिवार के स्नेह में समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला। अपनों के साथ बिताया हुआ वह दिन मेरे लिए काशी-यात्रा की एक अनमोल स्मृति बन गया।शाम होने पर मन तो अभी और रुकने का था, लेकिन वापस होटल लौटना आवश्यक था। इसलिए संध्या के समय बीएचयू से होटल के लिए चल पड़ा।रास्ते भर मन में एक ही विचार आता रहा—यह सब अपने आप नहीं हुआ। बाबा विश्वनाथ ने बुलाया, तभी काशी आने का अवसर मिला; और उनकी ही कृपा से दर्शन के साथ-साथ लंबे समय से बिछड़े अपने लोगों से मिलने की इच्छा भी पूरी हो गई।काशी की इस यात्रा ने मुझे केवल बाबा के दर्शन ही नहीं दिए, बल्कि अपनों का स्नेह भी दिया। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।मन ने फिर श्रद्धा से कहा—“बाबा, आपने बुलाया, दर्शन दिए और अपने प्रियजनों से मिलने का अवसर भी दिया। आपकी कृपा के बिना यह सब संभव नहीं था।”मेरे पास काशी दर्शन के लिए पूरा एक दिन और दो आधे-आधे दिन थे। समय सीमित था, लेकिन मन में इच्छा बहुत थी। इतने कम समय में भी कई मंदिरों में दर्शन करने का अवसर मिला। हर मंदिर अपने साथ एक अलग अनुभव और एक नई अनुभूति दे रहा था।पाँच अक्टूबर को काशी से दिल्ली लौटने के लिए हमारी वंदे भारत ट्रेन का टिकट दोपहर तीन बजे का था। इसलिए अब समय तेजी से बीत रहा था।काशी आने से पहले मन में केवल एक इच्छा थी—बाबा विश्वनाथ के दर्शन हो जाएँ। वह इच्छा पूरी हो चुकी थी। बाकी सब कुछ जैसे उस कृपा के सामने छोटा था।और मन बार-बार उसी भाव को दोहरा रहा था—महादेव का बुलावा — वापसी की यात्रामन में एक ही भाव था—“बाबा ने बुलाया है, तभी तो उनके दरबार में पहुँच पाया हूँ।”काशी आने की यात्रा में भी सब लोग एक साथ नहीं आ पाए थे। कुछ लोग बस से और कुछ रेलवे के माध्यम से काशी पहुँचे थे। हम सबने सोचा था कि वापसी भी रेलवे से ही एक साथ करेंगे, लेकिन बाबा की कृपा से तत्काल में सभी के लिए रेलवे की बर्थ उपलब्ध नहीं हो सकी। जिन लोगों का पहले से रेल का टिकट कन्फर्म था, वे हमारे साथ ही लौटे; बाकी लोगों को बस से ही दिल्ली के लिए रवाना होना पड़ा।अब काशी की यात्रा पूरी हो चुकी थी और लौटने का समय आ गया था। हम बाबा की नगरी से वंदे भारत एक्सप्रेस द्वारा दिल्ली के लिए रवाना हुए। मन में दर्शन की संतुष्टि थी और साथ ही काशी की गलियों, मंदिरों और गंगा के घाटों की स्मृतियाँ भी साथ थीं।लेकिन वापसी की रेलयात्रा भी अपने साथ एक अलग अनुभव लेकर आई।काशी से प्रयागराज तक पहुँचते-पहुँचते ट्रेन कुछ विलंब से चलने लगी थी। आगे प्रयागराज से कानपुर तक पहुँचने में लगभग तीस मिनट की देरी हो गई। मन में यह विश्वास था कि ट्रेन रास्ते में अपनी गति बढ़ाकर इस विलंब की भरपाई कर लेगी। हुआ भी कुछ ऐसा ही। ट्रेन ने आगे बढ़ते हुए काफी समय की भरपाई कर ली और गाजियाबाद तक पहुँचते-पहुँचते लगभग अपनी निर्धारित समय-सारिणी के करीब आ गई।लेकिन उसके बाद फिर ट्रेन की गति धीमी पड़ने लगी। साहिबाबाद पहुँचते-पहुँचते वह कई बार रुकने लगी और शिवाजी ब्रिज पर तो काफी देर तक खड़ी रही। अब रात गहराती जा रही थी और हमारी चिंता भी बढ़ती जा रही थी।आखिरकार वंदे भारत रात लगभग बारह बजकर बारह मिनट पर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 16 पर पहुँची। निर्धारित समय रात के ग्यारह बजे का था, लेकिन ट्रेन को पहुँचने में लगभग एक घंटे से अधिक की देरी हो चुकी थी।दिलचस्प बात यह थी कि स्टेशन पर ट्रेन के इतनी देर से पहुँचने की कोई स्पष्ट जानकारी पहले से किसी को नहीं थी। रात बढ़ती जा रही थी और हमें स्टेशन से अपने निवास तक पहुँचना था।स्टेशन से बाहर निकलकर ओला या अन्य टैक्सी बुक करने का प्रयास किया, लेकिन रात के उस समय कई बुकिंग लगातार रद्द होती रहीं। एक चिंता यह भी थी कि इतनी रात को कोई वाहन मिलेगा भी या नहीं।हमने आसपास पूछताछ की कि क्या काली-पीली टैक्सी मिल सकती है। किसी ने बताया कि इस समय रात बहुत हो चुकी है, इसलिए सामान्य रूप से मिलने वाली टैक्सियाँ भी आसानी से उपलब्ध नहीं होंगी।कुछ देर की परेशानी के बाद अंततः किसी तरह एक टैक्सी मिल गई। सामान लेकर उसमें बैठे और अपने निवास की ओर चल पड़े। रास्ते में रात का सन्नाटा था और दिन भर की थकान अब पूरी तरह शरीर पर हावी हो चुकी थी।घर पहुँचते-पहुँचते रात के लगभग दो बज चुके थे।यात्रा लंबी थी, थकाने वाली भी थी और रास्ते में कई छोटी-बड़ी परेशानियाँ भी आईं। कभी स्टेशन पर वाहन मिलने में कठिनाई हुई, कभी मंदिरों की भीड़ और सँकरी गलियों ने परीक्षा ली, कभी पूजा के नाम पर अनपेक्षित परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और अब वापसी में ट्रेन की देरी ने रात को और लंबा कर दिया था।लेकिन इन सबके बावजूद मन के भीतर एक गहरी संतुष्टि थी।बाबा विश्वनाथ के दर्शन हो गए थे।वर्षों से मन में संजोई इच्छा पूरी हो चुकी थी। काशी जाना, बाबा के दरबार में पहुँचना और उनके दर्शन करना—इन सबके बाद यात्रा में आई परेशानियाँ अब छोटी लग रही थीं।बिस्तर पर लेटते समय भी मन में काशी की वही छवि घूम रही थी—मंदिर की घंटियाँ, गंगा के घाट, आरती के दीप, सँकरी गलियाँ और बाबा विश्वनाथ का दिव्य स्वरूप।मन ने फिर धीरे से कहा—“बाबा ने बुलाया था, इसलिए मैं काशी पहुँचा। दर्शन भी हुए और अब उनकी कृपा से वापस अपने घर भी आ गया।”शायद यही काशी की सबसे बड़ी देन थी—यात्रा समाप्त हो गई थी, लेकिन बाबा के दर्शन की वह स्मृति मन में हमेशा के लिए ठहर गई थी।काशी की इस यात्रा की स्मृतियाँ मन में गहराई से उतर चुकी थीं। बाबा विश्वनाथ के दर्शन, गंगा के घाट, मंदिरों की घंटियाँ और अपनों से हुई मुलाकात—सब कुछ जैसे मन में एक अमिट छाप छोड़ गया था।अब लौटते समय मन में एक ही विश्वास था कि यह यात्रा यहीं समाप्त नहीं हुई है। यदि बाबा की इच्छा हुई और उन्होंने भविष्य में फिर बुलाया, तो रास्ते अपने आप बनते चले जाएँगे। टिकट की व्यवस्था भी हो जाएगी और आने-जाने का साधन भी अपने आप जुट जाएगा।मन ने श्रद्धा से कहा—“बाबा ने यदि फिर कभी बुलाया, तो टिकट और आने-जाने का इंतज़ाम भी अपने आप हो जाएगा। बुलावा आपका होगा, तो पहुँचने का रास्ता भी आप ही बना देंगे।”

