मुख्य चुनाव आयुक्त का पद: शेषन के सख्त तेवर से ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल तक, निष्पक्षता पर बहस

भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त के पद की छवि समय के साथ बदलती रही है। 1990 के दशक में टी. एन. शेषन ने आयोग को सख्त प्रवर्तन वाली संस्था के रूप में पहचाना, जबकि जे. एम. लिंगदोह के कार्यकाल को अक्सर स्वतंत्र भूमिका से जोड़ा गया। अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), मतदाता सूची से नाम हटाने और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इन मुद्दों पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता की बहस तेज हो गई है।
शेषन और लिंगदोह: संस्था की दो पहचान
टी. एन. शेषन दिसंबर 1990 से दिसंबर 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। उनके कार्यकाल में आदर्श आचार संहिता का कड़ा पालन, केंद्रीय बलों की तैनाती और बूथ कैप्चरिंग पर अंकुश जैसी कार्रवाइयों ने आयोग की सार्वजनिक छवि को मजबूत किया। बाद के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके कार्यकाल को संस्थागत दृढ़ता के उदाहरण के रूप में उल्लेख किया है।
जे. एम. लिंगदोह 2001 से 2004 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। 2002 के गुजरात विधानसभा चुनावों को कुछ समय के लिए टालने के फैसले को अक्सर आयोग की स्वतंत्र भूमिका से जोड़ा जाता है। दोनों कार्यकालों को अलग-अलग राजनीतिक संदर्भों में देखा जाता है, लेकिन दोनों में आयोग की स्वायत्तता सार्वजनिक बहस का हिस्सा रही।
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति और 2023 का कानून
ज्ञानेश कुमार, 1988 बैच के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी, मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त बने। उन्हें 17 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक है। वे 2023 के मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम के तहत पहले मुख्य चुनाव आयुक्त हैं।
इस कानून से पहले, मार्च 2023 में अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था दी थी कि नियुक्तियाँ प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर हों, जब तक संसद कानून न बनाए। 2023 के अधिनियम ने मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में रखा। अब समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक कैबिनेट मंत्री हैं। विपक्ष का कहना है कि इससे कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ता है। सरकार का रुख है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत नियुक्ति का कानून बनाने का अधिकार संसद को है। इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं और इन्हें संविधान पीठ के विचार के लिए भेजे जाने का मामला दर्ज है। विपक्ष के नेता ने ज्ञानेश कुमार की चुनाव आयुक्त और बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त दोनों नियुक्तियों पर असहमति दर्ज कराई थी।
SIR और मतदाता सूची से नाम हटाना
विशेष गहन पुनरीक्षण जून 2025 में बिहार से शुरू हुआ और बाद में अधिकांश राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया। द इंडियन एक्सप्रेस और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की प्रारूप मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए। यह आंकड़ा देश के मतदाताओं का लगभग 13 प्रतिशत बताया गया है।
चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया मृत, स्थानांतरित, डुप्लिकेट और अपात्र प्रविष्टियों को हटाने तथा योग्य मतदाताओं को शामिल करने के लिए है। आयोग के अनुसार, इतने बड़े स्तर पर गहन पुनरीक्षण करीब एक चौथाई सदी बाद हो रहा है। विपक्षी दल और कुछ कार्यकर्ता आरोप लगाते हैं कि पात्र मतदाताओं के नाम भी हट रहे हैं और प्रक्रिया से वंचित करने का खतरा है। आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि पुनरीक्षण राजनीतिक उद्देश्य से नहीं किया जा रहा।
हटाए गए नामों के खिलाफ अपील, नए नामांकन और छूटे मतदाताओं को फिर शामिल करने की प्रक्रिया भी जारी रही है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि आयोग ने SIR के दौरान या उसके बाद छूट गए मतदाताओं के लिए विशेष नामांकन अभियान के निर्देश दिए हैं। इन कदमों को आयोग सुधारात्मक प्रक्रिया बताता है, जबकि आलोचक इन्हें पहले की बड़ी कटौती की स्वीकृति मानते हैं।
आयोग के अंदर दर्ज आपत्तियाँ
23 सितंबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियाँ मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म में बदलाव, अपीलों और मतदाता डेटा के प्रबंधन तथा सुरक्षा से जुड़ी थीं। कुछ फैसलों के बारे में कहा गया कि वे दोनों आयुक्तों की जानकारी के बिना जारी हुए। एक मामले में कैबिनेट सचिव को भी शिकायत भेजे जाने का उल्लेख है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि SIR का राष्ट्रीय क्रियान्वयन तीनों आयुक्तों की निगरानी में रहा, लेकिन कुछ आदेशों पर दोनों आयुक्तों ने असहमति दर्ज की। चुनाव आयोग ने राजनीतिक हेरफेर के आरोपों से इनकार किया है। इन दावों की स्वतंत्र न्यायिक जाँच अभी पूरी नहीं हुई है।
संसद, अदालत और विश्वसनीयता की बहस
विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की माँग की है। रॉयटर्स के अनुसार, अप्रैल में संसद में हटाने का एक प्रयास खारिज हो चुका है। नई रिपोर्टों के बाद दोनों सदनों में फिर प्रस्ताव लाने की तैयारी का जिक्र है। हटाने का नोटिस अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है। संविधान के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी है और इसके लिए विशेष बहुमत तथा सिद्ध कदाचार या अक्षमता की जरूरत होती है।
सुप्रीम कोर्ट 5 अक्टूबर 2026 को उन याचिकाओं पर सुनवाई करने वाला है, जिनमें कहा गया है कि बहुसदस्यीय आयोग के फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले नहीं ले सकते। याचिकाओं में SIR से जुड़े फैसलों और 13 करोड़ नाम हटाने की प्रक्रिया की जाँच की माँग है। एक याचिका में मामले के लंबित रहने तक ज्ञानेश कुमार के निलंबन की भी मांग की गई है। अदालत ने अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
बहस का केंद्र तीन मुद्दे हैं। पहला, 2023 के कानून के बाद नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका की भूमिका। दूसरा, SIR में बड़े पैमाने पर नाम हटाने के मानदंड, अपील और पुनर्स्थापन की पारदर्शिता। तीसरा, तीन सदस्यीय आयोग के अंदर फैसले सर्वसम्मति से होते हैं या नहीं। आयोग का पक्ष है कि पुनरीक्षण कानूनी है और अपात्र नाम हटाने के लिए जरूरी है। विपक्ष और कुछ याचिकाकर्ता इसे निष्पक्षता पर असर डालने वाला बता रहे हैं। अंतिम आकलन अदालती आदेशों, प्रकाशित आंकड़ों और संसदीय प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।



