लिवर ट्रांसप्लांट के बाद करीब 9–10% मरीज फिर शराब पीने लगते हैं, नए लिवर में फैट-फाइब्रोसिस और मौत का खतरा बढ़ सकता है

भारत के लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट केंद्रों के अध्ययनों में अल्कोहल से जुड़ी लिवर बीमारी के कारण ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीजों में दोबारा शराब शुरू करने की दर करीब 9 से 10 प्रतिशत पाई गई है। यह आंकड़ा पश्चिमी देशों के कई अध्ययनों से कम है, लेकिन जिन मरीजों में भारी या लगातार शराब की वापसी होती है, उनमें नए लिवर को नुकसान और मृत्यु का जोखिम साफ तौर पर बढ़ जाता है।
एक बड़े भारतीय अध्ययन में अल्कोहलिक लिवर डिजीज के कारण लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट कराने वाले 408 मरीजों में से करीब 9.5 प्रतिशत में औसत करीब 35 महीने की फॉलो-अप अवधि में शराब की वापसी दर्ज हुई। इनमें से करीब 23 प्रतिशत भारी पीने वाले थे और उन सभी में ग्राफ्ट यानी नए लिवर की खराबी के लक्षण दिखे। एक अन्य भारतीय केंद्र के आंकड़ों में 203 ऐसे मरीजों में रिलेप्स दर करीब 9.85 प्रतिशत रही, जबकि नुकसानदायक यानी हानिकारक शराब सेवन इससे काफी कम रहा। एक और श्रृंखला में सार्थक शराब सेवन की दर करीब 5.8 प्रतिशत बताई गई।
इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं कि भारत में हर लिवर ट्रांसप्लांट मरीज का 9–10 प्रतिशत हिस्सा शराब पर लौटता है। यह दर मुख्य रूप से उन मरीजों की है जिनका ट्रांसप्लांट शराब से हुई लिवर बीमारी के कारण हुआ था। वैश्विक समीक्षाओं में किसी भी तरह की शराब वापसी करीब 20 प्रतिशत के आसपास और भारी सेवन करीब 10–15 प्रतिशत बताया गया है। भारत में अपेक्षाकृत कम दर का संबंध अक्सर मजबूत पारिवारिक सहयोग, लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट और नजदीकी फॉलो-अप से जोड़ा जाता है।
नए लिवर पर क्या असर पड़ता है
ट्रांसप्लांट के बाद शराब शुरू करने से नए लिवर में फैट जमा होना, सूजन और फाइब्रोसिस बढ़ सकता है। समीक्षा अध्ययनों में रिलेप्स करने वाले मरीजों में स्टीटोसिस यानी फैटी बदलाव का जोखिम कई गुना अधिक पाया गया। स्टीटोहेपेटाइटिस और एडवांस्ड फाइब्रोसिस या सिरोसिस का खतरा भी उन मरीजों में स्पष्ट रूप से ज्यादा रहा जिन्होंने दोबारा शराब पीना शुरू किया। भारतीय श्रृंखलाओं में भारी पीने वाले मरीजों की बायोप्सी में अल्कोहलिक हेपेटाइटिस, रिजेक्शन और कुछ मामलों में सिरोसिस देखा गया।
मौत के जोखिम पर अंतरराष्ट्रीय मेटा-विश्लेषण में 10 साल की फॉलो-अप पर रिलेप्स करने वाले मरीजों में मृत्यु की संभावना करीब तीन गुना अधिक बताई गई है। एक भारतीय अध्ययन में ट्रांसप्लांट के पहले साल के बाद मौत की दर सार्थक शराब सेवन वाले समूह में उन मरीजों से अधिक रही जिन्होंने शराब नहीं छोड़ी। कुल जीवित रहने की दर हर अध्ययन में एक जैसी नहीं मिली, लेकिन भारी और लगातार शराब सेवन को ग्राफ्ट लॉस और खराब नतीजों से जोड़ा गया है। कभी-कभार हल्की मात्रा में शराब लेने वालों के नतीजे कई रिपोर्टों में परहेज करने वालों के करीब रहे, जबकि नुकसान मुख्य रूप से भारी सेवन से जुड़ा दिखा।
जोखिम किन मरीजों में अधिक है
ट्रांसप्लांट से पहले कम अवधि की परहेज, पहले भी शराब छोड़कर फिर शुरू करना, मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं, परिवार का कमजोर सहयोग और दवाओं की अनियमितता रिलेप्स के प्रमुख संकेतों में गिने जाते हैं। भारतीय आंकड़ों में तीन महीने से कम या छह महीने से कम परहेज वाले मरीजों में वापसी की दर अधिक रही। जीवनसाथी या करीबी रिश्तेदार द्वारा दान कुछ अध्ययनों में सुरक्षात्मक कारक के रूप में सामने आया।
विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि ट्रांसप्लांट से पहले और बाद में मनोचिकित्सा व डी-एडिक्शन टीम की सक्रिय भूमिका, नियमित फॉलो-अप और परिवार की निगरानी से वापसी का जोखिम घटाया जा सकता है। शराब की वापसी केवल लिवर तक सीमित नहीं रहती। इससे दवाओं की अनियमितता, संक्रमण, हृदय संबंधी समस्याएं और नई घातक बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है।
डॉक्टरों के अनुसार लिवर ट्रांसप्लांट शराब से हुई बीमारी में जीवनरक्षक हो सकता है, लेकिन लंबे समय का लाभ तभी टिकता है जब मरीज शराब से पूरी तरह दूर रहे। हल्की या कभी-कभार की वापसी और भारी सेवन के नतीजे अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए किसी भी मात्रा को सुरक्षित मानकर चलना चिकित्सकीय सलाह के विरुद्ध है।



