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UPSC 100 Years: एक अंग्रेज की ‘मास्टरमाइंड प्लेबुक’ जिसने खड़ी की भारत की सबसे बड़ी टैलेंट ड्राफ्ट लीग

नई दिल्ली (1 अक्टूबर 2026): यह भारत के सबसे बड़े और सबसे कड़े टैलेंट हंट का 100वां साल है। ब्यूरोक्रेसी का ‘सुपर बाउल’—संघ लोक सेवा आयोग (UPSC)—आज अपनी शताब्दी मना रहा है। हर साल लाखों की तादाद में देश के सबसे बेहतरीन युवा इस लीग में अपनी जगह बनाने के लिए मैदान में उतरते हैं, लेकिन यह सब शुरू कैसे हुआ? इस विशाल संस्था की नींव के पीछे असल में एक अंग्रेज का दिमाग और एक लंबी, रणनीतिक ‘प्लेबुक’ (Playbook) थी।

आइए, 1 अक्टूबर 1926 से लेकर 26 जनवरी 1950 तक, और वहां से आज तक के इस ऐतिहासिक सफर के हर एक ‘क्वार्टर’ का गहराई से विश्लेषण करते हैं।

क्वार्टर 1: द किक-ऑफ (1 अक्टूबर 1926)

कहानी की शुरुआत 1924 में होती है, जब ब्रिटिश भारत में सिविल सेवाओं की रूपरेखा तय करने के लिए ली कमीशन (Lee Commission) का गठन किया गया था। इस कमीशन ने सिफारिश की कि भारत में उच्च अधिकारियों की भर्ती के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष बोर्ड होना चाहिए।

इसी कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 के तहत पहली बार 1 अक्टूबर 1926 को पब्लिक सर्विस कमीशन (Public Service Commission) की स्थापना हुई।

“लीग का पहला हेड कोच:” इस पहले कमीशन के अध्यक्ष बने एक अंग्रेज—सर रॉस बार्कर (Sir Ross Barker)। यह बार्कर की ही रणनीतिक दृष्टि थी जिसने परीक्षा प्रणाली के पहले नियम बनाए, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि चयन केवल मेरिट के आधार पर हो। उनका विजन ही वह फाउंडेशन था, जिस पर आज की यह गगनचुंबी इमारत खड़ी है।

क्वार्टर 2: द एक्सपेंशन ड्राफ्ट (1937)

जैसे-जैसे खेल बड़ा होता है, लीग का भी विस्तार होता है। 1935 में भारत सरकार अधिनियम (Government of India Act, 1935) पास हुआ, जिसने प्रशासन के नियमों को पूरी तरह बदल दिया।

इस अधिनियम के प्रभाव में आने के बाद, 1 अप्रैल 1937 को पब्लिक सर्विस कमीशन का विस्तार कर इसे फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन (Federal Public Service Commission – FPSC) का नाम दिया गया। अब इस संस्था की पहुंच और ताकत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुकी थी। यह एक क्षेत्रीय टैलेंट पूल से उठकर एक राष्ट्रीय स्तर की ‘फ्रेंचाइजी’ बन चुकी थी।

क्वार्टर 3: द अल्टीमेट हॉल ऑफ फेम (26 जनवरी 1950)

1947 में भारत को आजादी मिली। अब देश को चलाने के लिए किसी विदेशी लीग के नियमों की नहीं, बल्कि अपने खुद के संविधान की जरूरत थी। जब 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ, तो फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन को अपनी सबसे मजबूत और स्थायी पहचान मिली।

संविधान के अनुच्छेद 315 (Article 315) के तहत इसे यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) का नाम दिया गया। इसे एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय (Constitutional Body) बना दिया गया, जिसका काम भारत सरकार के सबसे अहम ‘प्लेयर्स’ (IAS, IPS, IFS और अन्य केंद्रीय सेवाएं) को ड्राफ्ट करना था।

गेम-चेंजिंग फैक्ट्स: एक नजर में UPSC का सफर

  • 1924: ली कमीशन ने एक स्वतंत्र लोक सेवा आयोग की सिफारिश की।
  • 1 अक्टूबर 1926: भारत के पहले पब्लिक सर्विस कमीशन का गठन। सर रॉस बार्कर पहले अध्यक्ष बने।
  • 1 अप्रैल 1937: गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत यह ‘फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन’ बना।
  • 26 जनवरी 1950: संविधान लागू होने के साथ ही यह आधिकारिक तौर पर ‘यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC)’ बन गया।
  • 1 अक्टूबर 2026: संस्था ने अपनी स्थापना के 100 साल (शताब्दी) पूरे किए।

द फाइनल व्हिसल: 100 साल की लेगेसी

सर रॉस बार्कर के नेतृत्व में जो एक छोटा सा कमीशन बना था, वह आज एक ऐसी अजेय संस्था बन चुका है, जिसके सामने देश की सबसे बेहतरीन प्रतिभाएं अपना दम दिखाती हैं। एक अंग्रेज के दिमाग से शुरू हुई यह प्रक्रिया, आज भारत की लोकतांत्रिक मशीनरी का सबसे भरोसेमंद इंजन है।

100 सालों का यह सफर सिर्फ एक आयोग का नहीं, बल्कि भारत के निर्माण और उन लाखों एस्पिरेंट्स के पसीने, धैर्य और ‘नेवर गिव अप’ वाले एटीट्यूड का जश्न है। UPSC की यह पिच आज भी तैयार है, और हर साल नए ‘चैंपियंस’ इस हॉल ऑफ फेम में अपनी जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष करते हैं।

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