यूपी में बाल ट्रॉमा केयर को इमरजेंसी नेटवर्क से जोड़ने का रोडमैप, गोल्डन ऑवर पर फोकस

लखनऊ, 1 अक्टूबर: उत्तर प्रदेश सरकार बाल ट्रॉमा केयर को मौजूदा इमरजेंसी स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने का रोडमैप तैयार कर रही है, ताकि दुर्घटना या गंभीर चोट के बाद बच्चों को समय पर विशेषज्ञ उपचार मिल सके। योजना का जोर गोल्डन ऑवर यानी शुरुआती एक घंटे में प्राथमिक उपचार, एंबुलेंस कनेक्टिविटी और सही ट्रॉमा केंद्र तक रेफरल पर है।
सरकारी योजना के अनुसार, यह व्यवस्था प्रदेश के बच्चों के लिए उच्च स्तर की और अपेक्षाकृत कम लागत वाली एकीकृत ट्रॉमा केयर का आधार बनेगी। बच्चों की आबादी को करीब 6 करोड़ बताया गया है। यह अनुमानित आंकड़ा है, क्योंकि जनगणना 2027 की अंतिम गिनती अभी पूरी नहीं हुई है।
एकीकृत ट्रॉमा नेटवर्क का ढांचा
प्रदेशव्यापी उत्तर प्रदेश ट्रॉमा एंड इमरजेंसी नेटवर्क (UPTEN) के तहत 173 इंटीग्रेटेड ट्रॉमा एवं इमरजेंसी मेडिसिन यूनिट विकसित करने का प्रस्ताव है। इनमें 11 लेवल-1 एपेक्स हब, 36 लेवल-2 क्षेत्रीय केंद्र और 126 लेवल-3 जिला स्तरीय इकाइयां शामिल हैं। अपर मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) अमित घोष के हवाले से जारी रिपोर्टों में कहा गया है कि पूरे नेटवर्क से हर साल करीब 10,000 से 12,000 जानें बचाने का लक्ष्य रखा गया है।
बाल ट्रॉमा से जुड़ी योजना में गंभीर रूप से घायल बच्चे को घटनास्थल से प्राथमिक उपचार, ट्रॉमा सेंटर, विशेषज्ञ देखभाल और आगे के रेफरल तक एक साझा नेटवर्क में लाने की बात कही गई है। इससे अस्पतालों के बीच अनावश्यक ट्रांसफर और इलाज में देरी घटाने का प्रयास होगा। कुछ सरकारी बयानों में बाल ट्रॉमा घटक से सालाना करीब 1,800 जानें बचाने का लक्ष्य बताया गया है। यह आंकड़ा स्वतंत्र रूप से सत्यापित आधिकारिक अध्ययन पर आधारित नहीं बताया गया है।
बेड, एंबुलेंस और गोल्डन ऑवर
योजना में इमरजेंसी विभागों में ट्रॉमा बेड की मौजूदा हिस्सेदारी करीब 3 से 5 प्रतिशत बताई गई है और इसे 12 से 15 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। नेटवर्क से करीब 2,853 नए बेड जुड़ने का भी उल्लेख किया गया है। इन बेड आंकड़ों की अलग से प्रशासनिक पुष्टि प्रमुख रिपोर्टों में नहीं मिली है।
व्यापक नेटवर्क में करीब 1,200 एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस को मोबाइल इमरजेंसी यूनिट के रूप में जोड़ने और 18 मंडलीय कमांड सेंटर बनाने का प्रस्ताव है। दुर्घटना या गंभीर आपात स्थिति के बाद शुरुआती 48 घंटे का इलाज निशुल्क रखने का विचार भी विचाराधीन बताया गया है। बाल ट्रॉमा घटक पर करीब 45 करोड़ रुपये खर्च का जिक्र कुछ रिपोर्टों में है, जबकि पूरे UPTEN का अलग बजट और मानव संसाधन ढांचा अभी प्रस्ताव के स्तर पर है।
सरकार का कहना है कि प्रशिक्षित टीम, एंबुलेंस और उपयुक्त ट्रॉमा केंद्र के समन्वय से बच्चों में चोट से होने वाली मौतों और देरी से इलाज के जोखिम को कम किया जा सकेगा। योजना लागू होने की समय-सीमा और अंतिम स्वीकृति का विवरण अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है।



