चुनाव आयोग के सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामे से क्या चीज़ें बदल जाएंगी? अब भी बचे हैं ये सवाल

चुनाव आयोग ने सोमवार को कहा कि जून 2025 से मई 2026 के बीच जारी किए गए स्पेशल इंटेसिंव रिविजन यानी एसआईआर से जुड़े तीनों आदेश सर्वसम्मति से जारी किए गए थे और वे क़ानूनी प्रावधानों के अनुरूप थे.
चुनाव आयोग ने सोमवार रात सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफ़नामे में यह बात कही है.
यह हलफ़नामा उस याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एसआईआर को लेकर एकतरफ़ा फ़ैसले लेने का आरोप लगाया गया है.
याचिका में कहा गया है कि इन फ़ैसलों के कारण मतदाता सूची के ड्राफ्ट फेज में 13.36 करोड़ नाम हटा दिए गए. उप निर्वाचन आयुक्त के हस्ताक्षर वाला यह हलफ़नामा मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से संयुक्त रूप से दाखिल किया गया है.
लीगल मामलों की न्यूज़ और विश्लेषण वेबसाइट बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, दिलचस्प बात यह है कि निर्वाचन आयोग ने यह भी कहा कि उसके हलफ़नामे को आयोग के तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से मंज़ूरी दी है.
हलफ़नामे पर मुख्य चुनाव आयुक्त से दोनों चुनाव आयुक्त की सहमति की बात इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से मेल नहीं खाती है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताया गया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने एसआईआर पर कई मामलों में खुलकर असहमति दर्ज कराई थी.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई केवल इसी मुद्दे पर नहीं है बल्कि चुनाव आयोग की अन्य कार्यप्रणालियों पर भी है.
यह जनहित याचिका यानी पीआईएल द इंडियन एक्सप्रेस की उन ख़बरों के बाद दाखिल की गई, जिनमें कहा गया था कि निर्वाचन आयोग के दोनों आयुक्तों ने फॉर्म 6 में बदलाव का विरोध किया था.
उनका तर्क था कि इस फॉर्म में बदलाव केवल केंद्र सरकार ही कर सकती है.
भारत के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच मंगलवार को इस जनहित याचिका और एसआईआर से संबंधित अन्य याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली है.
चुनाव आयोग ने इस याचिका पर सुनवाई को लेकर भी सवाल उठाए हैं. आयोग ने इसे ग़लत धारणाओं पर आधारित बताते हुए कहा कि यह पूरी तरह एक अख़बार की ख़बर पर आधारित है.
अपने हलफ़नामे में निर्वाचन आयोग ने फॉर्म 6 में संशोधन की बात से भी इनकार किया है.
इस वैधानिक फॉर्म का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करने में किया जाता है.
आयोग ने कहा कि उसने केवल उस घोषणा-पत्र के फॉर्मैट को सुव्यवस्थित किया था, जिसका इस्तेमाल बिहार में एसआईआर के दौरान किया गया था. दरअसल, चुनाव आयोग ने फॉर्म-6 के साथ अलग से एक घोषणा-पत्र जोड़ा था.
आयोग के मुताबिक़, ऐसा प्रक्रिया में तेज़ी लाने और उन मतदाताओं की मैपिंग करने के लिए किया गया, जो बिहार में मतदाता सूची के एसआईआर के दौरान नहीं हो सकी थी.
आयोग ने कहा कि इसके परिणामस्वरूप बिहार में मतदाताओं को दावे और आपत्तियों के चरण में फॉर्म 6 के साथ ज़रूरी दस्तावेज भी जमा करने पड़े थे.
अंजलि भारद्वाज सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता के लिए काम करती हैं.
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के हलफ़नामे पर भारद्वाज ने लिखा है, चुनाव आयोग ने अपने हलफ़नामे में कहा है कि घोषणा-पत्र, फॉर्म 6 का हिस्सा नहीं है, लेकिन 26 सितंबर 2026 की अपनी प्रेस विज्ञप्ति में ईसीआई ने कहा था, एसआईआर के लिए फॉर्म 6 के साथ संलग्न घोषणा-पत्र को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है. क्या जवाबदेही से बचने के लिए चुनाव आयोग शब्दों का खेल खेल रहा है?
चुनाव आयोग के हलफ़नामे से क्या चीज़ें अलग दिख रही हैं?
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि चुनाव आयोग के हलफ़नामे से उन दो आयुक्तों के रिकॉर्ड किए गए बयानों के बीच का विरोधाभास दूर नहीं होता.
फॉर्म 6, जिसके ज़रिए नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करते हैं, इस विवाद के केंद्र में है.
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, मई में, किसी भी बदलाव से पहले, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने कहा था कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन किए बिना इस फॉर्म को बदला नहीं जा सकता.
संधू ने भी इस बात से सहमति जताई थी. इसके बावजूद फॉर्म 6 के ऑनलाइन संस्करण में बदलाव कर दिया गया. जुलाई में संधू को इसकी जानकारी एक अख़बार की ख़बर से मिली और अगस्त में उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म में जोड़े गए घोषणा-पत्र को अनधिकृत/अवैध बताया.
हलफ़नामे में अब तर्क दिया गया है कि एसआईआर के लिए जो घोषणा-पत्र जोड़ा गया था, वह वैधानिक फॉर्म में संशोधन नहीं, बल्कि एक अलग दस्तावेज़ था.
हालांकि, इसमें यह स्वीकार किया गया है कि ऑनलाइन घोषणा-पत्र को इस तरह समझा जा सकता था, मानो फॉर्म 6 में संशोधन किया गया हो, जबकि ऐसा कोई संशोधन नहीं हुआ था. हलफ़नामे के मुताबिक़, इसे सुधारने के लिए अधिकारियों को कुछ क़दम उठाने की ज़रूरत थी.
आयोग के वोटर्स रजिस्ट्रेशन सेक्शन ने 21 अक्टूबर को यह फ़ैसला किया कि एसआईआर घोषणा-पत्र को ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में वैधानिक फॉर्म 6 से अलग रखा जाएगा.
हलफ़नामे में यह नहीं बताया गया कि जुलाई में ऑनलाइन व्यवस्था को किसने मंज़ूरी दी थी.
हलफ़नामे में कहा गया है कि घोषणा-पत्र को फॉर्म 6 के ऑनलाइन पेज में शामिल किया गया था लेकिन यह नहीं बताया गया कि ऐसा किसने किया.
इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, हलफ़नामे में पश्चिम बंगाल का विवरण भी उतना ही अहम है. इसमें कहा गया है कि मतदाताओं को मतदाता सूची में बहाल करने के आदेशों के ख़िलाफ़ अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में अधिकारियों ने दाखिल की थीं.
हलफ़नामे के मुताबिक़, इन मामलों को आयोग के संज्ञान में नहीं लाया गया. इसमें यह भी कहा गया है कि अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत अपील दाखिल करने का अधिकार था.
विवेक जोशी ने सबसे पहले इस मुद्दे पर सवाल उठाया था. सात अगस्त को, एक अख़बार में अपीलों की ख़बर आने के बाद, उनके कार्यालय ने राज्य के प्रभारी अधिकारी से तथ्यात्मक स्थिति मांगी. पाँच दिन बाद संधू ने उसी अधिकारी से पांच सवाल पूछे. रिकॉर्ड के मुताबिक, जोशी ने उनसे कहा था कि अधिकारी ने बताया है कि उनके पास इस मामले का विवरण नहीं है.
इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, संधू के नोट में दर्ज है कि पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने उनसे कहा था कि उन्हें भी इस मामले के विवरण की जानकारी नहीं है.
अब हलफ़नामे में कहा गया है कि अपीलें उनके कार्यालय के अधिकारियों ने दाखिल की थीं. इसमें 22 अक्तूबर को उस कार्यालय से जारी एक पत्र का हवाला दिया गया है. लेकिन दोनों बातों के बीच तालमेल नहीं दिख रहा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.(bbc.com/hindi)

