छत्तीसगढ़

आईएएस आनंद मसीह का जाति प्रमाणपत्र रद्द करने का आदेश निरस्त

हाईकोर्ट ने 90 दिन में दोबारा जांच के दिए निर्देश

छत्तीसगढ़ संवाददाता

बिलासपुर, 4 नवंबर। आईएएस अधिकारी आनंद मसीह के उरांव अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र को रद्द करने के मामले में हाईकोर्ट ने छानबीन समिति का आदेश निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों के बावजूद समिति ने अधिकारी को अपने खिलाफ बयान देने वाले गवाहों से जिरह करने और मौखिक व दस्तावेजी सबूत पेश करने का प्रभावी अवसर नहीं दिया। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने मामला दोबारा सुनवाई के लिए समिति को भेजते हुए 90 दिन के भीतर नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया है।

आनंद मसीह फिलहाल रायपुर में पुलिस जवाबदेही प्राधिकरण के सचिव हैं। उन्हें 22 जनवरी 1981 को उरांव जनजाति का प्रमाणपत्र जारी किया गया था। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर वे 1991 में मध्यप्रदेश में डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित हुए थे।

उनके मुताबिक दादा बलदेव प्रसाद 1915 में तत्कालीन मध्यप्रदेश के बिलासपुर क्षेत्र में आकर बस गए थे। उनके पिता ने भी यहां जमीन खरीदी थी। बाद में सामाजिक स्थिति को लेकर शिकायत होने पर छानबीन समिति ने 2007 में उनका प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया था।

मसीह ने समिति के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। 24 जुलाई 2018 को कोर्ट ने जांच प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाते हुए आदेश निरस्त कर नए सिरे से जांच करने को कहा था। राज्य सरकार की अपील भी 29 अगस्त 2019 को खारिज हो गई थी।

इसके बाद जनवरी 2021 में समिति ने फिर नोटिस जारी कर जांच शुरू की और फरवरी 2023 में दोबारा प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया। इस आदेश को भी आनंद मसीह ने चुनौती दी।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि समिति ने न तो प्रभावी व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया और न ही मौखिक तथा दस्तावेजी साक्ष्य पेश करने की अनुमति दी। राज्य सरकार ने कहा कि सामाजिक स्थिति साबित करने की जिम्मेदारी प्रमाणपत्र धारक की है और उन्होंने तीन पीढ़ियों का वंशवृक्ष तथा पुराने ऐतिहासिक दस्तावेज पेश नहीं किए।

हाईकोर्ट ने समिति के दोबारा जांच करने के अधिकार पर आपत्ति स्वीकार नहीं की, लेकिन सुनवाई की प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाईं। कोर्ट ने कहा कि जिन गवाहों के बयानों के आधार पर प्रमाणपत्र निरस्त किया गया, उनसे जिरह का अवसर दिए बिना उन बयानों को अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता। 1950 से पहले के दस्तावेज नहीं मिलना भी किसी दावे को खारिज करने का अकेला आधार नहीं हो सकता। समिति को सभी उपलब्ध दस्तावेजों, स्थानीय जांच, मौखिक साक्ष्य और अन्य पहलुओं का समग्र मूल्यांकन करना होगा।

हाईकोर्ट ने प्रमाणपत्र निरस्त करने का आदेश रद्द करते हुए समिति को जांच रिपोर्ट और विजिलेंस सेल की रिपोर्ट की प्रतियां उपलब्ध कराने, सभी प्रतिकूल गवाहों से जिरह का मौका देने और मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्यों पर विचार करने का निर्देश दिया है। इसके बाद कारणों सहित नया आदेश पारित करना होगा। पूरी प्रक्रिया कोर्ट के आदेश की प्रति मिलने के 90 दिन के भीतर पूरी करनी होगी।

इस बीच निरस्त किए गए आदेश के आधार पर आनंद मसीह की सेवा, वेतन, सेवानिवृत्ति या पेंशन लाभों के संबंध में कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।

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