नोएडा 4000 करोड़ लीजबैक घोटाले में वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी हरीश चंद्र बर्खास्त

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने नोएडा प्राधिकरण के तत्कालीन सचिव और 1997 बैच के वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी हरीश चंद्र को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज ने सोमवार 28 सितंबर 2026 को बर्खास्तगी का आदेश जारी किया। हरीश चंद्र उस समय कोलकाता में खाद्य एवं रसद विभाग के स्थानिक प्रतिनिधि के पद पर तैनात थे।
यह कार्रवाई नोएडा के ग्राम शहदरा से जुड़े लीजबैक मामले में विभागीय जांच, लोक सेवा आयोग की सहमति और इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के 3 सितंबर 2026 के आदेश के आधार पर हुई है। शासन के अनुसार, आरोप 27 नवंबर 2013 को संस्थित विभागीय अनुशासनिक कार्यवाही में सिद्ध पाए गए थे। आयोग ने 6 जनवरी 2022 को सहमति दी थी।
क्या है मामला
हरीश चंद्र नोएडा प्राधिकरण में सचिव रहते हुए ग्राम शहदरा के सेक्टर 140-ए, 141, 142 और 143 में प्राधिकरण द्वारा अर्जित एवं कब्जा प्राप्त भूमि के लीजबैक से जुड़े थे। जांच में 3,81,527 वर्ग मीटर भूमि को नियमों के विपरीत लीजबैक करने का उल्लेख है। कुछ दस्तावेजों में लगभग 4,00,447 वर्ग मीटर भूमि का भी जिक्र है, जिसका बाजार मूल्य करीब 4000 करोड़ रुपये आंका गया। कुछ रिपोर्टों में यह आंकड़ा करीब 3800 करोड़ रुपये भी बताया गया है।
नियमों के अनुसार लीजबैक सुविधा गांव के पात्र मूल काश्तकारों और निवासियों के लिए थी। एक परिवार के लिए अधिकतम सीमा भी तय थी। जांच रिपोर्ट के अनुसार सर्वे में सैटेलाइट इमेज का उपयोग नहीं किया गया, जबकि आबादी का निर्धारण उसी आधार पर होना चाहिए था। सर्वे आख्या में गांव के बाहर के निवासी, भू-मालिक और निजी कंपनियां शामिल कर ली गईं।
जांच में क्या सामने आया
जांच मेरठ के मंडलायुक्त को सौंपी गई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि लीजबैक समिति, प्राधिकरण बोर्ड और उच्च अधिकारियों के समक्ष भ्रामक आख्या प्रस्तुत की गई। कालम में मूल काश्तकार का नाम और विनियमितीकरण समिति को संदर्भित क्षेत्रफल का उल्लेख नहीं किया गया।
राजस्व अभिलेखों में दर्ज निजी कंपनियों—एस्टर इलेक्ट्रिक प्राइवेट लिमिटेड, महानंदा इलेक्ट्रॉनिक प्राइवेट लिमिटेड और प्रयास गारमेंट लिमिटेड—के मामले में तथ्यों को छिपाते हुए केवल कुलदीप शर्मा का नाम सर्वे में अंकित किया गया। शासन के अनुसार, भ्रामक आख्या के आधार पर बाहरी व्यक्तियों और कंपनियों के पक्ष में भूमि आवंटित की गई।
शासनादेश में कहा गया है कि वास्तविक तथ्यों को छिपाने, नियमों के विपरीत आख्या देने और निजी पक्षकारों को अनुचित लाभ पहुंचाने के कारण प्रथमदृष्टया दोष सिद्ध हुआ। विभागीय कार्रवाई अब समाप्त मानी गई है और अधिकारी को सेवा से बर्खास्त किया गया है।



