देश में पहली बार झरनों की गिनती: 10 राज्यों में 14,468 झरने मिले, मणिपुर और महाराष्ट्र सबसे आगे

जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, देश में पहली बार चल रहे झरना सर्वेक्षण के दूसरे भाग में 10 राज्यों के 14,468 झरनों की पहचान हुई है। इनमें मणिपुर और महाराष्ट्र सबसे आगे हैं। रिपोर्ट 25 सितंबर को भारत मंडपम में आयोजित नौवें भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह-2026 के समापन समारोह में जारी की गई।
सर्वेक्षण में मणिपुर में 3,941, महाराष्ट्र में 3,652, ओडिशा में 1,957, पश्चिम बंगाल में 1,686, गोवा में 1,196, त्रिपुरा में 1,049, असम में 792, तेलंगाना में 148, आंध्र प्रदेश में 34 और राजस्थान में 13 झरने दर्ज किए गए। रिपोर्ट का नाम ‘फर्स्ट सेंसस ऑफ स्प्रिंग्स (खंड-दो, भाग-दो)’ है। इसमें आंध्र प्रदेश, असम, गोवा, महाराष्ट्र, मणिपुर, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर और गंभीर स्थिति वाले झरनों की व्यवस्थित मैपिंग की जाए, बुनियादी ढांचा विकास के दौरान इनका संरक्षण सुनिश्चित किया जाए और झरना क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रमों के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जाए। इससे पहले खंड-दो की एक रिपोर्ट, जिसमें बिहार, कर्नाटक, केरल, लद्दाख, सिक्किम और तमिलनाडु शामिल थे, भारत जल दिवस 2026 पर जारी हो चुकी है।
महाराष्ट्र और मणिपुर के आंकड़े
महाराष्ट्र में 2,629 स्थायी, 909 मौसमी और 114 सूख चुके झरने हैं। कुल 3,652 झरनों में से 3,612 ग्रामीण क्षेत्रों में और 40 शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं। इनमें करीब 86.5 प्रतिशत झरने सार्वजनिक स्वामित्व वाले हैं, जबकि 13.5 प्रतिशत निजी स्वामित्व वाले हैं। राज्य में 265 यानी 7.6 प्रतिशत झरने खतरे का सामना कर रहे हैं।
मणिपुर में सर्वेक्षण किए गए 3,941 झरनों में से 3,419 बारहमासी, 457 मौसमी और 65 सूख चुके झरने हैं। राज्य में 91.4 प्रतिशत झरने सार्वजनिक स्वामित्व वाले हैं। यहां 1,336 झरने यानी करीब 34.5 प्रतिशत खतरे में पाए गए। राज्य में 3,127 झरनों का इस्तेमाल स्थानीय निवासी, 634 का इस्तेमाल गैर-निवासी और 113 का इस्तेमाल जंगली जानवर करते हैं।
अन्य राज्यों की स्थिति
ओडिशा में कुल 1,957 झरने हैं, जिनमें 1,568 बारहमासी, 315 मौसमी और 74 सूख चुके झरने शामिल हैं। इनमें करीब 96 प्रतिशत झरने सार्वजनिक स्वामित्व वाले हैं और 99.2 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। यहां 295 यानी 15.7 प्रतिशत झरने खतरे में हैं।
पश्चिम बंगाल में कुल 1,686 झरने हैं, जिनमें से 1,568 ग्रामीण क्षेत्रों और 118 शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं। इनमें दार्जिलिंग में 1,200 और कलिम्पोंग में 427 झरने हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन जिलों के कई ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए झरने पीने के पानी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
गोवा के 1,196 झरनों में से 1,105 बारहमासी, 66 मौसमी और 25 सूख चुके झरने हैं। इनमें से 662 सार्वजनिक स्वामित्व वाले और 509 निजी स्वामित्व वाले हैं। गोवा में 61 यानी 5.2 प्रतिशत झरनों पर खतरा मंडरा रहा है।
त्रिपुरा में 661 बारहमासी, 378 मौसमी और 10 सूख चुके झरने हैं। राज्य के सभी ऐसे जलस्रोत ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। सबसे अधिक 398 झरने धलाई जिले में हैं, इसके बाद उत्तर त्रिपुरा में 238 और खोवाई में 205 दर्ज किए गए।
असम में कुल 792 झरने दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 587 ग्रामीण और 205 शहरी क्षेत्रों में हैं। इनमें 662 बारहमासी, 127 मौसमी और तीन सूख चुके झरने हैं। तेलंगाना में 148 झरने और आंध्र प्रदेश में 34 झरने दर्ज किए गए हैं। राजस्थान में 13 झरने हैं, जिनमें 10 ग्रामीण क्षेत्रों में और तीन शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं। इनमें आठ बारहमासी और पांच मौसमी झरने हैं। ये सभी 13 झरने सार्वजनिक स्वामित्व वाले हैं।
20 करोड़ लोग झरनों पर निर्भर
रिपोर्ट में नीति आयोग के वर्ष 2018 के कार्य समूह की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि देश की करीब 15 प्रतिशत आबादी यानी लगभग 20 करोड़ लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से झरनों के पानी पर निर्भर हैं। संसद की जल संसाधन संबंधी स्थायी समिति की 2022-23 की रिपोर्ट में भी पहाड़ी इलाकों के झरनों को पुनर्जीवित करने और टिकाऊ प्रबंधन की सिफारिश की गई थी।
पहली स्प्रिंग सेंसस 7वीं लघु सिंचाई जनगणना, दूसरी जल निकाय जनगणना और पहली बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजना जनगणना के साथ की गई। इसका आधार वर्ष 2023-24 था। डेटा एंड्रॉइड आधारित मोबाइल ऐप के जरिए जुटाया गया और केंद्रीय वेब प्लेटफॉर्म पर संभाला गया।



