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छत्तीसगढ़: ‘केज कल्चर’ से बदल रही मछुआरों की जिंदगी, पीएम मत्स्य संपदा योजना से लाखों में हो रही कमाई

रायपुर: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार द्वारा मत्स्य क्षेत्र को आधुनिक तकनीक, अधोसंरचना और बेहतर आजीविका के अवसरों से जोड़ने के उद्देश्य से संचालित प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) का सकारात्मक प्रभाव अब छत्तीसगढ़ के सुदूर गांवों तक दिखाई दे रहा है। इस योजना के अंतर्गत अंतर्देशीय मत्स्यपालन, केज कल्चर और आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि मछुआरों और मछली किसानों की आय तथा रोजगार के अवसरों में वृद्धि हो सके।

छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के गौरेला विकासखंड स्थित ग्राम देवरगांव का मल्हनिया जलाशय इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और जिला खनिज न्यास निधि (DMFT) के सहयोग से ‘जय बूढ़ा देव मल्हनिया आदिवासी मछुआ सहकारी समिति मर्यादित’ के सदस्यों ने पारंपरिक मछली पकड़ने के तरीकों के साथ-साथ आधुनिक पिंजरा मछली पालन (केज कल्चर) को अपनाया है। इससे समिति के सदस्यों के लिए मछली उत्पादन, आय और रोजगार का एक नया और मजबूत आधार तैयार हुआ है।

54 केज ने बदली आजीविका की तस्वीर

वर्ष 2002 से संचालित जय बूढ़ा देव मल्हनिया आदिवासी मछुआ सहकारी समिति में वर्तमान में 44 मछुआ आदिवासी सदस्य जुड़े हुए हैं। इनमें 26 सदस्य विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) बैगा समुदाय से हैं। पहले समिति के सदस्य मुख्य रूप से जलाशय में पारंपरिक तरीकों से मछली पकड़कर और उसे बेचकर अपनी आजीविका चलाते थे।

जलाशय की लीज सहित अन्य खर्चों को निकालने के बाद समिति की वार्षिक आय लगभग ढाई से तीन लाख रुपये तक ही सीमित थी। मछुआरों की आजीविका को अधिक स्थायी और आय को बेहतर बनाने के उद्देश्य से मत्स्य पालन विभाग एवं जिला प्रशासन ने आधुनिक पिंजरा मछली पालन को बढ़ावा दिया। नतीजतन, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और डीएमएफटी के संयुक्त सहयोग से मल्हनिया जलाशय में कुल 54 केज स्थापित किए गए हैं।

केन्द्र की योजना, स्थानीय मेहनत और तकनीक का संगम

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना का एक प्रमुख उद्देश्य मत्स्य उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ मछुआरों एवं मछली किसानों की आय में वृद्धि और रोजगार के अवसर पैदा करना है। योजना में जलाशयों में केज कल्चर सहित अंतर्देशीय मत्स्यपालन को आधुनिक तकनीक से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है।

मल्हनिया जलाशय में योजना का यही उद्देश्य स्थानीय स्तर पर साकार होता दिखाई दे रहा है। केज में उन्नत प्रजातियों की मछलियों का पालन किया जा रहा है। पारंपरिक अनुभव के साथ आधुनिक तकनीक के जुड़ने से समिति के सदस्यों को अधिक उत्पादन और बेहतर बाजार अवसर प्राप्त हो रहे हैं।

एक साल में 10 से 15 लाख रुपये की मछली बिक्री

केज कल्चर शुरू होने के बाद समिति की आर्थिक गतिविधियों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, समिति द्वारा एक वर्ष में लगभग 10 से 15 लाख रुपये की मछली का विक्रय किया गया है। वर्तमान में भी केजों में लगभग 10 से 15 टन मछली उपलब्ध है।

इस गतिविधि से समिति की आय बढ़ने के साथ-साथ सदस्यों को नियमित रोजगार का अवसर भी मिल रहा है। समिति के सदस्यों के अनुसार, केज कल्चर से उन्हें प्रतिमाह लगभग 6 से 7 हजार रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। इससे परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में काफी मदद मिल रही है और आजीविका के लिए केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भरता कम हुई है।

मछुआरों के हुनर को मिली आधुनिक तकनीक की ताकत

मल्हनिया जलाशय की यह सफलता की कहानी यह दिखाती है कि जब पारंपरिक आजीविका को आधुनिक तकनीक और संस्थागत सहयोग का साथ मिलता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विकास के नए अवसर पैदा होते हैं। विशेष रूप से बैगा समुदाय के सदस्यों की इस पहल में सक्रिय भागीदारी इसे आजीविका सशक्तिकरण के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।

सरकारी योजनाओं का सफल जमीनी क्रियान्वयन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन के अनुरूप प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के माध्यम से मत्स्य क्षेत्र में उत्पादन, तकनीक और मछुआरों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण को प्रमुखता दी गई है। वहीं, छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन इन योजनाओं का लाभ अंतिम छोर के व्यक्तियों तक पहुंचा रहे हैं।

आज मल्हनिया जलाशय के मछुआरों के लिए केज कल्चर केवल मछली पालन की एक नई तकनीक नहीं, बल्कि अपनी पारंपरिक आजीविका को अधिक व्यवस्थित और आय-सृजनकारी बनाने का माध्यम बन गया है। यह साबित करता है कि सही योजना, तकनीकी सहयोग, स्थानीय प्रशासन की सक्रियता और हितग्राहियों की मेहनत अगर एक साथ मिल जाएं, तो ग्रामीण परिवारों के लिए स्थायी आजीविका और आर्थिक आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकता है।

राजेश कुमार

उत्तर भारत के एक छोटे शहर में पले-बढ़े। बचपन से ही लोगों की बातें सुनना और आसपास की ज़िंदगी को ध्यान से देखना उनकी आदत रही है। परिवार में सादगी और मेहनत को हमेशा महत्व दिया गया। खाली समय में किताबें पढ़ना, पुरानी डायरियाँ पलटना और सड़क किनारे चाय की दुकान पर बैठकर आम लोगों से बात करना उन्हें अच्छा लगता है। वे मानते हैं कि हर इंसान की अपनी एक कहानी होती है, बस उसे सुनने वाला कोई होना चाहिए।

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