चार साल से निश्शुल्क शिक्षा की अलख संस्कृत और कथक से संवार रहीं बच्चों का भविष्य
राजनांदगांव: संस्कृत के श्लोक अब केवल किताबों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गीतों की मिठास, नृत्य की लय और खेलों की रोचकता के साथ विद्यार्थियों की जुबान पर चढ़ रहे हैं। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तिलई की व्याख्याता डा.आकांक्षा विश्वकर्मा अपनी नवाचारी शिक्षण पद्धति से संस्कृत जैसी प्राचीन भाषा को नई पीढ़ी से जोड़ने में जुटी हैं। उन्होंने संस्कृत को सरल और सहज बनाने के लिए पढ़ाने का ऐसा तरीका अपनाया है, जिसमें पढ़ाई बोझ नहीं, बल्कि आनंददायक अनुभव बन जाती है। वे विद्यार्थियों को गीत, नृत्य, खेल-कूद, आधुनिक तकनीक और विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से संस्कृत सिखाती हैं। उनके प्रयासों से विद्यार्थी न केवल संस्कृत व्याकरण और श्लोकों को आसानी से समझ रहे हैं, बल्कि उनका गायन भी सहजता से कर रहे हैं।
डा. विश्वकर्मा पिछले चार वर्षों से निशुल्क बाल केंद्र का संचालन कर रही हैं। यहां बच्चों को संस्कृत के साथ गायन और कथक नृत्य का प्रशिक्षण दिया जाता है। अब तक 200 से अधिक बच्चों को इन विधाओं की शिक्षा दे चुकी हैं। संस्कृत शिक्षण के साथ कथक नृत्य में पीएचडी होने के कारण वे अपनी कलात्मक विशेषज्ञता का लाभ भी बच्चों को निशुल्क दे रही हैं।
रटने की जगह गीतों और खेलों से सीख रहे व्याकरण
डा.आकांक्षा ने संस्कृत पढ़ाने का ऐसा तरीका विकसित किया है, जिसमें कठिन लगने वाले व्याकरण के नियम भी सहज हो जाते हैं। वे सुभाषितों और श्लोकों को गीतों के रूप में सिखाती हैं। कारक रचनाओं और धातु रूपों को याद कराने के लिए गायन, चित्रात्मक प्रस्तुति, खेल-कूद और विभिन्न गतिविधियों का सहारा लेती हैं। आधुनिक तकनीक और रोचक शिक्षण विधियों के माध्यम से विद्यार्थी संस्कृत व्याकरण को समझने के साथ श्लोकों का गायन भी आसानी से कर रहे हैं। उनका जोर केवल परीक्षा में अच्छे अंक दिलाने पर नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को संस्कृत संभाषण कला में दक्ष बनाने पर भी है, ताकि वे इस भाषा को समझने के साथ बोल भी सकें।
संस्कृत के प्रचार-प्रसार में भी सक्रिय
डा. आकांक्षा विश्वकर्मा वर्ष 2009 में संस्कृत विषय में एमए करने के बाद शिक्षण क्षेत्र से जुड़ीं। संस्कृत की व्याख्याता के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने नवाचार को अपनी शिक्षण पद्धति का आधार बनाया। वे संस्कृत भारती, राजनांदगांव की विभाग संयोजिका भी हैं और भाषा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। बता दें कि डा. विश्वकर्मा सर्वजन हिताय शिक्षा फाउंडेशन संस्थान की ओर से सम्मानित भी हो चुकी है।
