हिंदी विश्वविद्यालय के डॉ. अनिर्बाण घोष ने पीकिंग की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़ा शोध पत्र।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र के भाषा विद्यापीठ अंतर्गत अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा अध्ययन विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अनिर्बाण घोष ने 19–20 सितंबर को चीन के प्रतिष्ठित पीकिंग विश्वविद्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में सहभागिता कर शोध पत्र प्रस्तुत किया। डॉ. घोष की इस अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहभागिता को विश्वविद्यालय की वैश्विक शैक्षणिक उपस्थिति और भारत-चीन सांस्कृतिक एवं भाषाई अध्ययन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इस उपलब्धि पर कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने इसे विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय पहचान के रूप में रेखांकित करते हुए प्रो. अनिर्बान घोष को बधाई दी है। पीकिंग विश्वविद्यालय के पूर्वी साहित्य अनुसंधान केंद्र तथा विदेशी भाषा विद्यापीठ के प्राच्य अध्ययन विभाग की स्थापना के 80 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. घोष ने “चीन में भारतीय भाषाओं का अध्ययन : पीकिंग विश्वविद्यालय के प्राच्य अध्ययन विभाग की स्थापना में चीनी और भारतीय विद्वानों का योगदान” विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया।संगोष्ठी में भारत के दो विश्वविद्यालय महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय सहित ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड और एडिनबर्ग विश्वविद्यालय, अमेरिका के न्यूयॉर्क, फिलीपींस के मनीला , जर्मनी के बॉन, दक्षिण कोरिया के सियोल, मंगोलिया राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वियतनाम के चियांग माई विश्वविद्यालय तथा चीन के लगभग 20 से अधिक विश्वविद्यालयों के करीब 70 विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया।संगोष्ठी के दौरान एशिया तथा विश्व में प्राच्य विद्या के इतिहास, वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। विद्वानों ने विशेष रूप से चीन में भारत अध्ययन की लगभग एक शताब्दी पुरानी परंपरा तथा उसके समकालीन महत्व पर चर्चा की। उल्लेखनीय है कि चीन में भारत अध्ययन की औपचारिक शुरुआत लगभग 100 वर्ष पूर्व पीकिंग विश्वविद्यालय से ही हुई थी।इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में पीकिंग विश्वविद्यालय के अतिरिक्त चिंगहु, रेनमिन, बीजिंग फॉरेन स्टडीज़ विश्वविद्यालय तथा शंघाई, चोंगकिंग, निंगश्या और वुहान सहित विभिन्न क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों के विशेषज्ञों ने भी सहभागिता की।
