छत्तीसगढ़

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : उत्तर और दक्षिण की दो स्कूलों में अलग-अलग किस्म की हिंसा से उठते हैं कई गंभीर सवाल…

देश के दो अलग-अलग प्रदेशों में कल हुई दो घटनाएं कई बातों पर सोचने के लिए मजबूर करती हैं। हरियाणा में तीसरी कक्षा के एक बच्चे ने अपनी ही स्कूल की केजी की एक छात्रा को क्लास के भीतर इस बुरी तरह पटक-पटककर मारा, और उसके बाद ईंट लेकर उसे ईंट से बुरी तरह कुचला, बाल पकडक़र घसीटे। यह सब कुछ स्कूल के सीसीटीवी कैमरे में कैद हुआ है। इस बच्ची को अस्पताल में 40 घंटे बाद होश आया है। डॉक्टरों का कहना है कि उसके चेहरे की कई हड्डियां टूट गई हैं, और उसे प्लास्टिक सर्जरी की जरूरत पड़ेगी। सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने यह लिखा है कि 8 बरस के इस बच्चे की हिंसा देखते भी नहीं बनती है। अब हरियाणा सरकार ने स्कूल के खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज की है, जिसे लापरवाह माना गया है। अभी मिली जानकारी के अनुसार तीसरी कक्षा का यह 8 बरस का बच्चा छोटी सी बच्ची को किसी बहाने से पहली मंजिल के क्लासरूम में ले जाकर उसका सिर बार-बार बेंच पर पटकता है, जूतों से मारता है, बालों से घसीटता है, और उसके बाद ईंट पटक-पटककर उसे मारता है। बच्ची के पिता का कहना है कि जब दूसरे बच्चों ने मारने वाले इस बच्चे से पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया, तो उसका जवाब था कि उसे इसमें मजा आता है। बच्ची का पिता मेहनत-मजदूरी करके कमाने वाला गरीब है। इतनी छोटी सी उम्र में बच्ची के साथ हुई ऐसी भयानक हिंसा से बाकी जिंदगी भी उसके दिमाग पर असर बना रहेगा।

अब एक दूसरी घटना आंध्रप्रदेश की है, वहां एक सरकारी स्कूल में 10वीं की एक क्लास में एक नौजवान घुस गया, और वह बैटरी से चलने वाली आरी लेकर गया था जिससे लोग पेड़ काटते हैं। उसने एक छात्रा पर हमला कर दिया, उसके दाएं हाथ को काट दिया, और चेहरे सहित कई जगह जख्मी कर दिया। कुछ दूसरे बच्चे भी इस हमले में जख्मी हुए, और कम से कम एक लडक़ी ने हमलावर को रोकने की कोशिश की, उसे भी उसने घायल कर दिया। एक सरकारी स्कूल में दिनदहाड़े भरी हुई क्लास में ऐसा हमला सभी माँ-बाप के हौसले पस्त करता है। अभी तक स्कूल में बाहर से आकर ऐसी हिंसा सिर्फ अमरीका जैसे देश में सुनाई पड़ती थी जहां बंदूकों से लोगों को थोक में मारने की एक सिरफिरी संस्कृति है, वहां हर महीने किसी न किसी जगह स्कूल के कई लोगों को मार डाला जाता है। लेकिन बैटरी से चलने वाली पेड़ तक काट डालने वाली ऐसी भयानक आरा मशीन से किसी पर हमले का ऐसा मामला तो स्कूल तो छोड़ दें, किसी और जगह भी सुनाई नहीं देता है।

इन दोनों घटनाओं में किसी एक तरह की दिमागी हालत नहीं है, दोनों अलग-अलग हैं, लेकिन अलग-अलग उम्र के दो लोगों के दिमागों में हिंसा की बात एक सरीखी है। आठ बरस का बच्चा जिस किस्म की हिंसा कर रहा है, और एक नौजवान स्कूल में जाकर जिस तरह आरी से काट डाल रहा है, ये दोनों ही लंबे मानसिक इलाज के लायक मामले हैं। यह नौजवान बालिग सुनाई पड़ता है, और उसके लिए तो सजा भी अलग किस्म की रहेगी। अब सवाल यह है कि हम अपने आसपास ही हर दिन कहीं न कहीं नाबालिगों को चाकूबाजी करते देखते हैं। अभी एक मामला तो ऐसा था जिसमें बिरयानी खाने के लिए किसी आम जगह पर सोए हुए आदमी की जेब से पैसे चुरा रहे नाबालिगों ने उसके जाग जाने पर चाकू मार-मारकर उसका कत्ल कर दिया। एक भी ऐसे किस्म के जुर्म नहीं हैं जिनमें नाबालिग सुनाई न पड़ते हों। और तो और छत्तीसगढ़ के एक सुधारगृह में रखे गए लडक़ों में से दर्जनभर लडक़े वहीं के गार्ड का कत्ल करके फरार हो गए थे। एक दूसरे सुधारगृृह में खिडक़ी तोडक़र भाग गए थे, एक और जगह वे गैस सिलेंडर लेकर सुधारगृह की छत पर पहुंच गए थे, और वहां से नीचे लोगों पर फेंकने की धमकी दे रहे थे। अब स्कूल और घर छोड़े हुए नाबालिग नशा करने के साथ-साथ नशा बेचने और नशे की तस्करी में भी लग गए हैं। ये सारी बातें अच्छी तरह दर्ज होती जा रही हैं। अब यह समझ से परे है कि इस उम्र में बेघर हो चुके, नशेड़ी बन चुके ये नाबालिग बच्चे और क्या-क्या नहीं करेंगे?

यह समझने की जरूरत है कि ऐसी नाबालिग पीढ़ी के सामने जिंदगी का कोई मकसद नहीं दिखता है कि जिसके लिए वे अपने आपको बचाकर रखें। बालिग बनने के पहले वे कई किस्म के नशे के आदी हो चुके रहते हैं, कई किस्म के जुर्म की कमाई पर जिंदा रहना सीख चुके रहते हैं, और जवान होते बदन की जरूरत को पूरा करने के लिए वे तरह-तरह के सेक्स-अपराध भी करते रहते हैं। कई ऐसे अपराध सामने आए हैं जिनमें बालिग मुजरिमों के साथ, उनके गिरोह में नाबालिग भी शामिल थे। इस तरह उनकी ट्रेनिंग भी जुर्म की होते चल रही है। आज जिन लोगों को यह लगता है कि जुर्म की राह पर चल पड़े ऐसे बच्चे अपने ही परिवारों की दिक्कत हैं, तो उन्हें याद रखना चाहिए कि नशे के लिए ऐसे नाबालिग या बालिग किसी भी दिन सडक़ पर या किसी सार्वजनिक जगह पर किसी भी संपन्न या साधारण व्यक्ति की पसलियों में चाकू उतारकर नशे के लायक पैसा जुटा सकते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले मुम्बई में एक फिल्म अभिनेता पर हुए हमले में जिस तरह के साधारण नौजवान शामिल थे, उससे यह बात समझ पड़ती है कि देश में किसी बड़े व्यक्ति का कत्ल करने के लिए भी कुछ लाख रूपए लेकर सुपारी उठाने को तैयार लोगों की कमी नहीं है। जब समाज में ऐसे लोगों का अनुपात बढ़ते चलेगा, तो अपने आपको बंद घरों और बंद कारों में सुरक्षित महसूस करने वाले लोग भी सुरक्षित नहीं रह जाएंगे।​

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