‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सरकार के बाहर के विशेषज्ञ ही सोच सकते थे प्रश्न-बैंक जैसी मौलिक बात, अमल हो

भारत में परीक्षा सुधारों के लिए बनाई गई हाई पॉवर टास्कफोर्स के मुखिया नंदन नीलेकेणि ने मौजूदा परीक्षा प्रणाली में बदलाव के दो तरीके सुझाए हैं। केन्द्र सरकार ने नीट इम्तिहानों में हुई गड़बड़ी के बाद शर्मिंदगी के बीच भारत में आधार कार्ड के जनक नंदन नीलेकेणि को परीक्षा सुधार का जिम्मा भी दिया था। कुछ महीने इस मुद्दे पर काम करने के बाद अब उन्होंने एक कार्यक्रम में परीक्षा सुधार के बारे में यह मौलिक सोच सामने रखी है। उनका मानना है कि पहले से प्रश्न पत्र तैयार होने से लोगों में उसे बेचकर कमाई करने का लालच होता है। उनका सोचना है कि बहुत सारे सवालों का एक सवाल-बैंक बनाना चाहिए, और इम्तिहान के ठीक पहले एआई के इस्तेमाल से इनमें से प्रश्न पत्र बना लेना चाहिए। जब न पहले से प्रश्न पत्र होगा, न उसकी बिक्री की आशंका रहेगी, तो पेपर आउट होने जैसे विवाद खड़े नहीं होंगे। उन्होंने एक दूसरी बात यह सुझाई है कि परीक्षाओं को कम्प्यूटर पर लिया जाए, और इसके लिए परीक्षा केन्द्रों का नेटवर्क बढ़ाया जाए। उनके हिसाब से अभी भारत में डेढ़ लाख ऐसी जगहें हैं जहां पर छात्र-छात्राएं कम्प्यूटरों पर परीक्षा दे सकते हैं, ऐसे नेटवर्क को बढ़ाने की जरूरत है। टेक्नॉलॉजी कंपनियों के मुखिया रहे नंदन नीलेकेणि के अलावा इस कमेटी में इसरो के एक पूर्व प्रमुख, आईबी के एक पूर्व डायरेक्टर, केन्द्र की एक पूर्व शिक्षा सचिव, आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर जैसे विशेषज्ञ भी हैं। यह रिपोर्ट अगले पखवाड़े तक केन्द्र सरकार को दाखिल कर देने की उम्मीद है।
जब कभी सरकार अपने ढांचे के बाहर के विशेषज्ञों को किसी काम का जिम्मा देती है, तब कुछ नई सोच भी सामने आती है। सरकारों में काम करने वाले लोगों के दिल-दिमाग में सबसे पहले यह उठने लगता है कि कौन सा काम कैसे-कैसे नहीं हो सकेगा। लेकिन बाहर के लोग, कामयाब कारोबार, या विशेषज्ञता के लोग यह सोचना शुरू करते हैं कि कौन सा काम कैसे-कैसे हो सकता है। सोचने का यही फर्क सरकार के बाहर से राय लेने, या योजना बनवाने में महत्वपूर्ण होता है। आज अगर किसी इम्तिहान के पूरे पाठ्यक्रम से हजार सवाल तैयार किए जाएं, और फिर परीक्षा के कुछ घंटे पहले किसी एक जगह बैठकर एआई की मदद से उनमें से 20 सवालों का पर्चा तैयार किया जाए, उन्हें इंसानी नजरों से गुजार दिया जाए, और फिर उन्हें इंटरनेट या मोबाइल फोन से निर्धारित समय पर सभी केन्द्रों को भेज दिया जाए। वहां पर उसके प्रिंट निकालकर परीक्षार्थियों को दे दिए जाएं, या किसी स्क्रीन पर उन्हें डिस्प्ले कर दिया जाए। यह एक आसान तरकीब है जिसे देश भर में बदनाम पर्चों की बिक्री थम सकती है। परीक्षा शुरू होने के समय जब सब परीक्षार्थी भीतर आकर बैठ चुके हों, गेट बंद हो चुका हो, तब किसी भी फोटोकॉपियर और प्रिंटर से ऐसे प्रिंट निकालकर बांटे जा सकते हैं, जो कि परीक्षार्थियों से दो-चार मिनट पहले ही उस परीक्षा केन्द्र के अधिकारी-कर्मचारी देख पाएँगे। यह समाधान बड़ा आसान है, लेकिन पहली नजर में ही यह सुहाता है क्योंकि यह आधार कार्ड जैसा आसान काम है। लोगों को याद होगा कि नंदन नीलेकेणि ने ही यूपीए सरकार की दी हुई आधार कार्ड की चुनौती को मंजूर किया था, और अपने कारोबार को छोडक़र पूरा समय इस आधार कार्ड प्रणाली को विकसित करने में लगाया था। एक वक्त नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए आधार कार्ड के बड़े आलोचक थे, लेकिन बाद में प्रधानमंत्री बनने के बाद जब उन्होंने आधार कार्ड की भूमिकी देखी, तो उन्होंने सरकार के बाकी दायरों में भी इसके इस्तेमाल को बढ़ाया, और आज आधार कार्ड पूरी दुनिया में सबसे बड़ा पहचान पत्र है, जिसका सबसे अधिक कामकाज में इस्तेमाल भी होता है।



