संसद में जलवायु परिवर्तन पर सवाल कुल प्रश्नों का महज 3.3 प्रतिशत: CFA रिपोर्ट

मैं इस दावे की फैक्ट-चेक कर रहा हूँ और उसके आधार पर गूगल न्यूज़ गाइडलाइन के अनुसार साफ HTML आर्टिकल तैयार करूँगा।
सेंटर फॉर फाइनेंसियल अकाउंटेबिलिटी (CFA) की रिपोर्ट ‘क्लाइमेट ऑन द फ्लोर’ के अनुसार, दिसंबर 2015 से दिसंबर 2025 के बीच लोकसभा और राज्यसभा में पूछे गए कुल संसदीय प्रश्नों में जलवायु परिवर्तन से जुड़े सवालों की हिस्सेदारी महज 3.3 प्रतिशत रही। इस अवधि में जलवायु और पर्यावरण से संबंधित 8,702 प्रश्न दर्ज किए गए, जिनमें 713 तारांकित और 7,989 अतारांकित प्रश्न शामिल हैं।
रिपोर्ट पेरिस समझौते के बाद के एक दशक में भारत की संसदीय बहस का विश्लेषण करती है। इसमें साफ ऊर्जा और डीकार्बोनाइजेशन पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया गया, जो जलवायु संबंधी प्रश्नों का लगभग 37.7 प्रतिशत है। इसके उलट जलवायु वित्त पर सवाल महज 0.3 प्रतिशत और वैश्विक जलवायु शासन पर 1.3 प्रतिशत रहे। न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार कुछ श्रेणियों में ये आंकड़े क्रमशः 33.81 प्रतिशत, 0.26 प्रतिशत और 1.2 प्रतिशत बताए गए हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि संसदीय रुचि अक्सर घटना-आधारित रही। फरवरी 2021 में उत्तराखंड ग्लेशियर फटने के बाद ग्लेशियर पिघलने और बादल फटने से जुड़े सवाल बढ़े, जबकि 2022 की रिकॉर्ड गर्मी के बाद पहली बार हीटवेव पर पर्याप्त चर्चा हुई। इससे पहले हीटवेव को संसदीय स्तर पर गंभीर खतरे के रूप में कम ही देखा गया था।
नेशनल अडाप्टेशन फंड फॉर क्लाइमेट चेंज (NAFCC), जो कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता था, को वित्त वर्ष 2023-24 से ‘नॉन-स्कीम’ खर्च के रूप में पुनर्वर्गीकृत कर दिया गया और इसके तहत नई परियोजनाएं शुरू नहीं की गईं। सरकार ने अलग जलवायु परिवर्तन कानून या उच्चाधिकार समिति के प्रस्तावों को यह कहते हुए खारिज किया कि मौजूदा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम पर्याप्त है।
रिपोर्ट के अनुसार सत्तारूढ़ गठबंधन के सदस्य अक्सर पीएम-कुसुम और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी योजनाओं की स्थिति जानने वाले प्रश्न पूछते हैं, जबकि विपक्षी सदस्य क्रियान्वयन की कमियों, धन की कमी और नीतिगत प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हैं। वायु प्रदूषण से मौत या बीमारी के सीधे संबंध पर सरकार ने संसद में कहा है कि आहार और जीवनशैली जैसे अन्य कारकों के कारण कोई निर्णायक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
रिपोर्ट में जलवायु-प्रेरित पलायन, अनौपचारिक कामगारों की हीटवेव से मौत और जंगल की आग से नष्ट हुए सटीक क्षेत्र पर केंद्रीय आंकड़ों की कमी का भी जिक्र है। साथ ही यह रेखांकित किया गया है कि सांसद जलवायु संकट को किसान संकट, सार्वजनिक स्वास्थ्य और ऊर्जा सुरक्षा जैसे विकास संबंधी मुद्दों से जोड़कर देखते हैं, लेकिन निगरानी और जवाबदेही के बीच अंतर बना हुआ है। रिपोर्ट को पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जारी किया।



