दबाव, धमकी और सैन्य कार्रवाई शांति की बड़ी बाधा; होर्मुज से बातचीत तक तैयार है ईरान: राजदूत फतहली

नई दिल्ली। भारत में ईरान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फतहली ने कहा है कि पश्चिम एशिया में युद्ध को समाप्त करने और स्थायी शांति की राह में सबसे बड़ी बाधा दबाव, धमकी और सैन्य कार्रवाई की नीति है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तेहरान कूटनीति से इनकार नहीं कर रहा है, लेकिन दबाव और धमकी के तहत बातचीत स्वीकार नहीं करेगा।
राजदूत फतहली के अनुसार, मौजूदा मुद्दों का समाधान संवाद और बातचीत से निकाला जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी बातचीत आपसी सम्मान और समानता पर आधारित होनी चाहिए तथा इसमें धमकी या बल प्रयोग नहीं होना चाहिए। उनका कहना था कि स्थायी शांति दबाव, धमकी या एकतरफा शर्तें थोपने से नहीं बन सकती।
फतहली ने कहा कि ईरान का तात्कालिक लक्ष्य युद्ध समाप्त करना और शत्रुता रोकना है। उन्होंने कहा कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान युद्ध को समाधान नहीं मानता और कूटनीति तथा संवाद पर लौटने के लिए तैयार है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ईरान बातचीत और आत्मरक्षा, दोनों के लिए तैयार है, लेकिन युद्ध उसकी पसंद नहीं है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के मुद्दे पर राजदूत ने बताया कि ईरान ने मध्यस्थों के जरिए एक चरणबद्ध प्रस्ताव दिया था। इस प्रस्ताव के तहत तेहरान सात दिनों के भीतर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से खोलने और परमाणु मुद्दे समेत सहमत विषयों पर अमेरिका से बातचीत शुरू करने के लिए तैयार था, बशर्ते अमेरिका भी जवाबी कदम उठाए। इन कदमों में नौसैनिक नाकाबंदी और ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी तत्काल हटाना, तेल निर्यात से जुड़ी पाबंदियां निलंबित करना, जब्त संपत्तियां जारी करना तथा लेबनान और यमन समेत क्षेत्र के सभी मोर्चों पर संघर्षविराम शामिल था।
भारत की भूमिका पर फतहली ने सकारात्मक रुख जताया। उन्होंने कहा कि भारत आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रभावशाली देशों में शामिल है और पश्चिम एशिया तथा फारस की खाड़ी के देशों के साथ उसके संबंध संतुलित हैं। उनके अनुसार, यह पृष्ठभूमि भारत को तनाव कम करने और संवाद बढ़ाने में मददगार बनाती है। उन्होंने भारत को शांति, स्थिरता और बहुपक्षवाद का महत्वपूर्ण स्वर बताया तथा भारत की रचनात्मक भूमिका का स्वागत किया।
राजदूत ने यह भी कहा कि यदि कूटनीति, आपसी सम्मान और अंतरराष्ट्रीय कानून का वास्तविक मार्ग बहाल होता है, तो ईरान उसमें शामिल होने के लिए तैयार है। उनका कहना था कि क्षेत्रीय स्थिरता का टिकाऊ रास्ता सैन्य प्रभुत्व से नहीं, बल्कि देशों की संप्रभुता के सम्मान, नागरिकों की सुरक्षा और कूटनीति की ओर गंभीर वापसी से निकलता है।



