पत्रकारिता में साहित्य, चिंतन-मनन का घटता स्थान चिंतनीय :कुमुद।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र में ‘हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष : विरासत, सरोकार और विकसित भारत का संकल्प’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन गुरुवार, 5 नवंबर को हुआ। समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने की। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई के पूर्व कुलपति प्रो. राम मोहन पाठक तथा सारस्वत अतिथि के रूप में दैनिक भास्कर, नागपुर के समूह संपादक प्रकाश दुबे ने संबोधित किया।अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद पत्रकारिता अत्यंत तेजी से बदल रही है। वर्तमान में पत्रकारिता में साहित्य और चिंतन-मनन से जुड़े मुद्दे गायब हो रहे हैं। साहित्यिक संपादक का दौर चला गया है, यहीं कारण है कि अनेक साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो गई है। वैश्विक मीडिया के आने के कारण मीडिया ग्राहक केंद्रित बन गया है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने संचार का नया चेहरा प्रस्तुत किया है और दिवाली, होली, तीज जैसे त्यौहार की संस्कृति को भी भुनाया जा रहा है। इससे एक तरह का डिजिटल साम्राज्यवाद आया है। सोशल मीडिया ने मनोविज्ञान और वाणिज्य का ऐसा संबंध बनाया है जिससे मादक पदार्थ की तरह इसकी नशा युवा पीढ़ी में फैल रही है और इससे बचाव के लिए मोबाइल नशा मुक्ति केंद्र खोले जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमें सुरक्षित भविष्य के लिए सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर विकसित भारत का मार्गक्रमण करना होगा। संपादक प्रकाश दुबे ने विकसित भारत की संकल्पना पर विचार रखते हुए कहा कि केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि नागरिकों की खुशहाली, बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर सुनिश्चित करना भी इसकी संकल्पना में होने चाहिए और खुशहाली के लिए व्यक्तिगत स्वाधीनता की रक्षा भी होनी चाहिए। उनका कहना था कि विकास पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सरकारी विज्ञप्तियों का प्रकाशन करना नहीं, बल्कि विकास से जुड़े मुद्दों को उठाना, कमियों को सामने लाना और सरकार को रचनात्मक सुझाव देना भी है। प्रो. राममोहन पाठक ने भारतीय पत्रकारिता की परंपरा, मूल सरोकारों और राष्ट्र के विकास में उसकी भूमिका पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि परंपरा दो पैरों पर चलती है और मनुष्य का जीवन भावनाओं का संसार है। पत्रकारिता की मूल आत्मा उसके सरोकारों में निहित है। पत्रकारिता केवल घटनाओं की सूचना देने भर तक सीमित न रहकर राष्ट्र के महत्वपूर्ण मुद्दों और जनहित के विषयों को प्राथमिकता देने की व्यापक भावना की होनी चाहिए। उनका कहना था कि बदलते परिदृश्य में बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करते हुए सम्यक रूप से पत्रकारिता को सनातन, निरंतर और नित्य नूतन बनाए रखना चाहिए। समापन सत्र में स्वागत वक्तव्य प्रो. के. बालराजू ने दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजेश लेहकपुरे ने किया। कार्यक्रम का प्रतिवेदन डॉ. रेणु सिंह ने प्रस्तुत किया तथा जनसंपर्क अधिकारी बी.एस. मिरगे ने धन्यवाद ज्ञापित किया। अतिथियों द्वारा मीडिया समय का विमोचन इस अवसर पर किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ कुलगीत से तथा समापन राष्ट्र गीत व राष्ट्र गान से किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

