छत्तीसगढ़

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कहीं जंग से बर्बादी, तो कहीं चुनावी नतीजों को भी देखें…

दुनिया के कई देशों में जल्द से हुई, और चल रही उथल-पुथल के बीच अब चुनावों से भी कुछ देशों में फेरबदल हो रहा है। ब्राजील में ट्रम्प समर्थित उम्मीदवार की बुरी शिकस्त के बाद वह कुनबे सहित देश छोडक़र भाग गया है, और खबर है कि अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने उसे एक पड़ोसी देश के रास्ते वहां से निकालकर एक विशेष विमान से अमरीका भेजा है। ईरान के पुराने शाह का बेटा भी अमरीका में डेरा डालकर बैठा हुआ है, और ईरानी जनता को उकसाने के लिए बीच-बीच में बयान देते रहता है कि वह वहां की इस्लामिक सरकार की जगह एक बेहतर सरकार बनाने के लिए योजना लिए तैयार बैठा है। इधर इजराइल में आज चुनावी नतीजे आने शुरू हुए हैं, और सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री नेतन्याहू वाले गठबंधन को अभी तक लीड मिल रही है, लेकिन अगली सरकार किसकी बनेगी, यह अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। वहां पर बहुत अटपटे किस्म के गठबंधनों के बिना किसी सरकार के बनने की उम्मीद थी भी नहीं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना था कि यह चुनाव इजराइल के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण चुनाव था जो कि न सिर्फ फिलीस्तीन, लेबनान, और ईरान जैसे मोर्चों पर जनता की सोच रखने वाला था, बल्कि इजराइल के भीतर भी सरकार का रूख कितना लोकतांत्रिक, या कितना अलोकतांत्रिक रहे, इस पर जनता वोट डालने वाली थी। अब जब नेतन्याहू आगे दिख रहा है, तो इसका श्रेय लेने के लिए अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प कूदकर सामने आ गया है कि उसके समर्थन की वजह से नेतन्याहू को जीत मिल रही है।

दुनिया में अभी रूस और यूक्रेन की जंग खत्म हुई नहीं है, उसका असर बाकी दुनिया में फैला हुआ है। इधर खाड़ी के देशों में भारी अस्थिरता चल ही रही है। ईरान पर इजराइली उकसावे पर अमरीकी अगुवाई में हुए फौजी हमले से खुद अमरीका का जितना नुकसान हुआ है, अमरीका उससे उबर नहीं पाया है, और वहां चल रहे मध्यावधि चुनाव में सत्तारूढ़ राष्ट्रपति की लोकप्रियता ऐतिहासिक गिरावट दर्ज कर चुकी है। अपनी बेअक्ली और अपने घमंड के मेल के साथ अमरीका की फौजी ताकत का इस्तेमाल करते हुए ट्रम्प ने अपने देश को एक ऐसी फजीहत में डाला है कि उसकी मिसाल एक ऐसे जानवर से ही हो सकती है जिसने किसी बर्तन में सिर तो घुसा दिया, लेकिन अब सिर निकालते नहीं बन रहा है। सिर पर बर्तन लिए-लिए ट्रम्प वोटरों का सामना भी कर रहा है, और उसके खेमे में अपने को महफूज मानने वाला सउदी अरब हूथियों के लगातार हमलों को झेलते हुए उनसे समझौता करने के लिए शायद प्लेन भरकर नगदी रकम लेकर ईरान जाकर बैठा है कि हूथियों को समझाओ। यह सारी अस्थिरता इजराइल और ट्रम्प की बददिमागी से पैदा हुई है, और अब परमाणु हथियार संपन्न पाकिस्तान के साथ मिलकर मुस्लिम देश तरह-तरह के फौजी गठबंधन बना रहे हैं। इन सबकी बुनियाद इसी बात पर है कि ट्रम्प अब भरोसेमंद नहीं रह गया है, वह दुश्मन चाहे न हो, दोस्त के रूप में भी वह मददगार नहीं है, इसलिए खाड़ी के और बाकी मुस्लिम देशों को इजराइल और दूसरे खतरों के मुकाबले अपनी हिफाजत का इंतजाम खुद करना है। एक परमाणु हथियार वाले देश पाकिस्तान की अहमियत ऐसे गठबंधनों में इसलिए भी बढ़ गई है कि वह अकेला परमाणु-संपन्न इस्लामी देश है। धर्म और परमाणु हथियार का यह घातक मेल आगे चलकर अपने खतरे बताएगा, लेकिन ट्रम्प और नेतन्याहू ईरान को नेस्तनाबूद करने के अपने युद्धोन्माद के चलते इन खतरों को अनदेखा कर रहे हैं, और अपने आपको अमरीका अधिक से अधिक अप्रासंगिक बना रहा है।

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