पत्रकारिता ना तो पक्ष है ना विपक्ष, यह असल में जनपक्ष है : पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा महाराष्ट्र के जनसंचार विभाग द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह में सप्रे संग्रहालय, भोपाल के संस्थापक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि पत्रकारिता ना तो पक्ष है ना विपक्ष, यह असल में जनपक्ष है।हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष : विरासत, सरोकार और विकसित भारत का संकल्प’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी का उद्घाटन बुधवार, 04 नवंबर को कस्तूरबा सभागार में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने की। इस अवसर पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बलदेवभाई शर्मा सारस्वत अतिथि तथा कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति प्रो. मनोज दयाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. सुरेन्द्र गादेवार मंचासीन थे।पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने मुद्रित माध्यमों के गौरवपूर्ण इतिहास की क्रमिक घटनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने भाषा और अभिव्यक्ति की गुण सम्पन्नता के साथ शैली तथा कौशल की महत्ता पर ध्यान केंद्रित कराया। साथ ही पत्रकारिता की विभिन्न परंपराओं का स्मरण किया। हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा को रेखांकित करते हुए उन्होंने युगल किशोर शुक्ल, भारतेंदु हरिचंद्र, बाबूराव पराडकर आदि की पत्रकारिता को समृद्ध ऐतिहासिक विरासत बताया।प्रो. मनोज दयाल ने कहा कि मैं पत्रकारिता का इतिहास जब पढ़ता हूं तो खून में आग लगने लगती है। पत्रकारिता में आज अर्थशास्त्र के सिद्धांत लागू हो रहे हैं। पत्रकारिता से भावनाएं लुप्त होती जा रही है। भारत की पत्रकारिता में समाचार की परिभाषा पश्चिम से ली गई। उस परिभाषा को भारतीय परिप्रेक्ष्य में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि संवेदना और भावनाएं पत्रकारिता के केंद्र में होनी चाहिए। उन्होंने हिंदी अखबारों का डिजिटल संग्रहालय बनाने का प्रस्ताव रखा।प्रो. बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि भारतीय हिंदी पत्रकारिता का 200 वर्षों का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। स्वाधीनता के बाद भारतीय पत्रकारिता के इतिहास को पत्रकारों और विद्यार्थियों को पर्याप्त रूप से नहीं पढ़ाया गया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का अध्ययन और अध्यापन किया जाए, तो केवल मीडिया पर्सन नहीं, बल्कि वास्तविक अर्थों में पत्रकार तैयार होंगे। जिनका दायित्व गलत का विरोध करना है, चाहे वह सरकार की हो या समाज की। लोककल्याण और राष्ट्रीय चेतना को पत्रकारिता के दो प्रमुख स्तंभ बताते हुए उन्होंने आत्मचिंतन का संदेश दिया और कहा— “बाहर की तू माटी फाँके, मन के अंदर क्यों न झाँके।” उन्होंने कहा कि लोककल्याण व राष्ट्रीय चेतना ही पत्रकारिता का सरोकार होना चाहिए।अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को पढ़ते समय औपनिवेशिक दासता से मुक्ति की गाथा दिखाई देती है। स्वाधीनता आंदोलन की पत्रकारिता आंदोलन का एक प्रमुख शस्त्र बन गयी थी। हिंदी पत्रकारिता को संघर्ष की गाथा बताते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकारिता पर लोकतांत्रिक मूल्यों के संवर्धन का बड़ा दायित्व है।स्वागत वक्तव्य मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ के अधिष्ठात प्रो. के. बालराजु ने दिया। कार्यक्रम का प्रास्ताविक जनसंचार विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजेश लेहकपुरे ने किया। संचालन जनसंचार विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. रेणु सिंह ने किया तथा सहायक प्रोफेसर डॉ. संदीप कुमार वर्मा ने आभार ज्ञापित किया। अतिथियों का स्वागत सूतमाला, शॉल एवं विश्वविद्यालय का प्रतीक चिन्ह से किया गया। इस अवसर पर स्मारिका का विमोचन, जनसंचार विभाग की ओर से वृत्तचित्र का प्रदर्शन तथा मीडिया समय का विमोचन किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं कुलगीत गायन से किया गया।इस अवसर पर वीणा पत्रिका के संपादक राकेश शर्मा, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई के पूर्व कुलपति प्रो. राममोहन पाठक, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी सहित विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।



