छत्तीसगढ़

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कतरा-कतरा वर्तमान को अनदेखा करने वालों की जगह इतिहास में ही रहेगी

अभी-अभी ब्राजील में ट्रंप के घनघोर विरोध लूला ने ऐतिहासिक तरीके से उथल-पुथल करके चुनाव जीता है। पहले राउंड में वे अपने ट्रंप समर्थक उम्मीदवार से बहुत पीछे थे, और उसके बाद दूसरे राउंड में उन्होंने ब्राजील की चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा उठापटक कर दिया, और वे ऐतिहासिक तरीके से जीत गए। हालत यह हुई कि ब्राजील के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के प्रतिद्वंद्वी बोलसेनारो के पासपोर्ट जब्त करने का आदेश दिया था, लेकिन ट्रंप के सीआईए ने पड़ोस के देश अर्जेंटीना की सरकार के साथ मिलकर बोलसेनारो को वहां से निकाला, और विशेष विमान करके अमरीका बुलवा लिया। ब्राजील में एक वामपंथी, और 81 बरस के राष्ट्रपति लूला जिस धमाके के साथ चुनाव जीतकर सामने आए हैं, और जिस तरह से उन्होंने ट्रंप और सीआईए की साजिशों को हरा दिया, वह भी देखने लायक है। लगे हाथों इजराइल की भी चर्चा कर लें जहां ट्रंप के जुर्म के भागीदार प्रधानमंत्री नेतन्याहू का गठबंधन सत्ता खो बैठा है, और वहां की जटिल सरकार निर्माण प्रक्रिया में अब इसके विरोधी दो गठबंधनों के मिलकर सरकार बनाने के आसार दिख रहे हैं। अब हम तीसरी बात पर आते हैं जिसकी वजह से आज सुबह इस पर लिख रहे हैं। अमरीका के मध्यावधि चुनाव के नतीजे भारत की इस सुबह खबरों में बने हुए हैं, और ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार एक-एक करके हारते चले जा रहे हैं, और ट्रंप आदतन शिकस्त का ठीकरा फोडऩे के लिए दूसरे सिर छांट चुका है। उसने सार्वजनिक टिप्पणी की है कि अगर वह उम्मीदवार रहता तो वोट बहुत अधिक मिले रहते, इस टिप्पणी से उसी की रिपब्लिकन पार्टी के लोग बहुत खफा हैं।

दुनिया में जिस तरह से सत्ता में फेरबदल हो रहा है, या सत्तारूढ़ पार्टी शिकस्त पा रही है, वह देखने लायक है। उन देशों के भीतर की राजनीतिक ताकतों के भी, और बाकी दुनिया में जहां कहीं भी चुनाव होते हैं, वहां सारी पार्टियों और नेताओं को भी गौर करना चाहिए कि एक चुनाव में अंधाधुंध, अंधड़ की तरह जीतने वाले लोगों के पांव किस तरह अगली चुनावी सुनामी में उखड़ जाते हैं। अभी पिछले ही हफ्ते सर्बिया में छात्रों के एक आंदोलन के बाद हुए चुनाव में 14 बरस से चली आ रही सरकार को ऐसी बुरी शिकस्त दी गई कि जिसका सबक सभी को लेना चाहिए। राष्ट्रपति एलेक्जेंडर वुचिच की पार्टी 2012 से सत्ता में थी। लेकिन पिछले दो बरस से एक ऐसा छात्र आंदोलन भ्रष्टाचार और सरकारी लापरवाही के खिलाफ चल रहा था जिसका कोई नेता नहीं था, और न चेहरा था। ऐसे गुमनाम और बेचेहरा छात्रों ने चुनाव में अपने उम्मीदवारों की एक लिस्ट तैयार की, और इसमें डॉक्टर, कलाकार, प्रोफेसर और दूसरे अच्छे-भले पेशेवर लोगों को शामिल किया। चुनाव हुआ तो इस बेचेहरा लिस्ट के उम्मीदवारों को 52 फीसदी से अधिक वोट मिले, और 14 बरस की सत्तारूढ़ पार्टी को 39 फीसदी। 250 मेंबरों की संसद में छात्रों की सूची को 135-140 सीटें मिलने का अंदाज है। इन छात्रों ने बिना किसी छात्रनेता चेहरे के सरकार के खिलाफ बेचैनी के आंदोलन को चुनावी राजनीति में बदल दिया, और डेढ़ दशकों की सत्ता को उखाड़ फेंका ! तो एक सवाल यह उठता है कि क्या दुनिया में अब राजनीतिक पार्टियों के बजाय आंदोलन भी चुनाव जीतने लगे हैं? हालांकि हिंदुस्तान में यूपीए सरकार के खिलाफ साजिशन बनाए गए इंडिया अगेन्स्ट करप्शन नाम के आंदोलन को झाड़ू पार्टी बना दिया गया था, और इसे यूपीए सरकार पलटने के लिए एक बल्ली की तरह इस्तेमाल किया गया था, जैसे कि लकड़ी के ल_ों को पलटाने के लिए बल्लियों का इस्तेमाल होता है।

दुनियाभर में जो उथल-पुथल है, उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत अलग-अलग देशों को है। 2022 में श्रीलंका में छात्रों और नौजवानों के एक बड़े आंदोलन ने राष्ट्रपति राजपक्षे को सत्ता छोडऩे को मजबूर किया था। उस वक्त वहां आर्थिक संकट की स्थितियां थीं, जिन्हें अनदेखा करके कोई विश्लेषण ठीक नहीं है। इसके बाद 2024 का बांग्लादेश का छात्र आंदोलन आता है जिसमें सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ, और बाद में वह सरकार विरोधी आंदोलन बन गया, प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्तीफा देकर देश भी छोड़ देना पड़ा। उनकी सरकार भी डेढ़ दशक से सत्ता पर थी, लेकिन छात्र आंदोलन के अंधड़ ने सिंहासन को पलट दिया। अगले ही बरस 2025 में, कुल 13 महीने बाद नेपाल में नौजवानों का एक ऐसा आंदोलन सामने आया जो अलग मुद्दों को लेकर था। वहां की सरकार ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया था, क्योंकि सत्ता पर बैठे हुए लोगों की औलादों की फिजूलखर्ची की तस्वीरों से सोशल मीडिया पटा हुआ था, और देश उसके खिलाफ उबलने लगा था। तो सरकार को आसान तरीका लगा कि सोशल मीडिया पर ही रोक लगा दी जाए। नतीजा यह हुआ कि पिछले दो बरस में सबसे अधिक चर्चा में बना हुआ एक शब्द, जेन-जी सामने आया। नेपाल ने जेन-जी ने इस प्रतिबंध, सत्ता के भ्रष्टाचार और राजनीतिक परिवारवाद के खिलाफ आंदोलन किया। आंदोलन उग्र होते चले गया, हिंसक प्रदर्शन हुए, कुछ आगजनी हुई, और प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली को इस्तीफा देकर जान बचाकर सरकारी बंगले से भागना पड़़ा। नए चुनाव हुए तो एक नई राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने 275 में से 182 सीटें जीत लीं, और एक नौजवान रैप सिंगर-महापौर बालेन शाह प्रधानमंत्री बन गए।

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