कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में इंडो-पैसिफिक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न, ब्लू इकोनॉमी और सहयोग पर जोर

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंडियन ओशन एंड इंडो-पैसिफिक स्टडीज द्वारा आयोजित इंडो-पैसिफिक विषयक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का सफलतापूर्वक समापन हो गया। सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया और संवाद से सहयोग तथा सहयोग से क्रियान्वयन की दिशा पर विशेष बल दिया।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल ने कहा कि हरियाणा के मध्य में स्थित कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का समुद्र, समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक जैसे विषयों पर अंतरराष्ट्रीय मंच आयोजित करना यह दर्शाता है कि भौगोलिक दूरी बौद्धिक दूरी नहीं होती। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र, सामाजिक विज्ञान, पर्यावरण और भू-विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ समुद्री एवं क्षेत्रीय नीतियों में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। यह कार्यक्रम कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में आयोजित हुआ।
ब्लू इकोनॉमी और वैश्विक सहयोग
केंद्र के निदेशक प्रो. वी. एन. अत्री ने ब्लू इकोनॉमी के सतत विकास और वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने आयोजकों, संयोजकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया। प्रो. वीरेन्द्र पाल ने कहा कि सम्मेलन की चर्चा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से आगे बढ़कर भारत, हिंद महासागर, आईओआरए, बिम्स्टेक, आसियान, आईपीओआई, बंगाल की खाड़ी, इंडो-पैसिफिक तथा अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तक पहुंची।
उन्होंने कहा कि इन मंचों के उद्देश्य अलग हो सकते हैं, लेकिन उनके बीच सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं। आवश्यकता किसी एक व्यवस्था को दूसरे का विकल्प बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें एक-दूसरे का पूरक बनाने की है। समापन संबोधन में उन्होंने पांच संकल्पों का आह्वान किया—संवाद से सहयोग, सहयोग से क्रियान्वयन, सुरक्षा से व्यापक मानव सुरक्षा, आर्थिक विकास से सतत समृद्धि, तथा अलग-अलग संस्थानों से जुड़े ज्ञान नेटवर्क की ओर बढ़ना।
विशेषज्ञों के विचार
सुबह के सत्र में सेंटर फॉर ब्लू इकोनॉमी, अमेरिका के शोध निदेशक प्रो. चार्ल्स कोलगन ने कहा कि ब्लू इकोनॉमी पर चर्चा पिछले करीब 15 वर्षों से हो रही है और हिंद महासागर क्षेत्र के लगभग सभी देशों में इससे जुड़ी गतिविधियां चल रही हैं। उन्होंने इसे साझा वैश्विक महासागर अर्थव्यवस्था के रूप में देखने की आवश्यकता बताई।
डॉ. बद्री नारायणन, संस्थापक एवं निदेशक, इनफिनिट सम मॉडलिंग एलएलसी, अमेरिका ने स्थानीय और क्षेत्रीय आयामों, विशेषकर महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में जल संकट और सामुदायिक नवाचारों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि उनके अध्ययन का केंद्र स्थानीय जल प्रबंधन और ग्रामीण समाधान हैं।
ड्यूक विश्वविद्यालय के ओशन पॉलिसी प्रोग्राम निदेशक प्रो. जॉन विर्डिन ने कहा कि समुद्र में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के साथ मिलकर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है। महासागर मानव गतिविधियों से उत्पन्न अतिरिक्त ऊष्मा का लगभग 90 प्रतिशत और अतिरिक्त कार्बन का 25 से 30 प्रतिशत से अधिक अवशोषित कर रहा है।
स्टैटिस्टिक्स नॉर्वे की वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. क्रिस्टीन एम. ग्रिम्सरुड ने नॉर्वे में चल रहे मरीन इकोसिस्टम अकाउंटिंग पायलट प्रोजेक्ट की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नॉर्वे समुद्री संसाधनों के आर्थिक उपयोग और पारिस्थितिकी संरक्षण के बीच संतुलन के लिए आंकड़ा-आधारित व्यवस्था विकसित कर रहा है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ला रीयूनियन, फ्रांस की प्रो. ऐन-फ्रांस्वाज़ ज़त्तारा ने कहा कि समुद्री कानून में संसाधनों के स्वामित्व और उपयोग की अवधारणाओं में समय के साथ बदलाव आया है। उन्होंने बीबीएनजे संधि को समुद्र के शासन में इस बदलाव का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया। नालंदा विश्वविद्यालय के प्रो. एस. के. मोहंती ने कहा कि ब्लू इकोनॉमी केवल समुद्री परिवहन और मत्स्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि, पर्यटन, विनिर्माण और सेवाओं से भी जुड़ी है।
समापन सत्र में प्रो. रोनान लॉन्ग ने बीबीएनजे समझौते तथा जलवायु परिवर्तन से संबंधित अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं की सलाहकारी राय पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और प्रदूषण का त्रिगुणित वैश्विक संकट विकासशील देशों पर अधिक गंभीर है। ओपीआरआई-एसपीएफ, जापान के वरिष्ठ शोध फेलो प्रो. इमादुल इस्लाम ने क्षेत्रीय साझेदारी को ब्लू इकोनॉमी के लिए महत्वपूर्ण बताया।
गुरुग्राम विश्वविद्यालय की पूर्व डीन प्रो. नीरा वर्मा ने कहा कि अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को केवल अलग-थलग संसाधन क्षेत्र नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत के केंद्र में स्थित रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखना चाहिए। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के भूभौतिकी विभाग के प्रो. भगवान सिंह चौधरी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मीठे जल संसाधनों तक सीमित नहीं है, इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। प्रो. अशोक चौहान ने शोध उपलब्धियां साझा कीं। डॉ. किरण लांबा ने अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।
गुरु गोबिंद सिंह जी पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के पोस्टर का विमोचन
इसी अवसर पर गुरु गोबिंद सिंह चेयर द्वारा आयोजित दो दिवसीय बहुविषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘श्री गुरु गोबिंद सिंह जी: व्यक्तित्व, बाणी एवं विरासत’ के पोस्टर का विमोचन कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने किया। संगोष्ठी 22 और 23 अक्टूबर 2026 को विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में आयोजित होगी।
कुलगुरु ने कहा कि श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन, दर्शन, बाणी और मानवीय मूल्य आज भी मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं। ऐसे आयोजन युवा पीढ़ी को गुरु साहिब के जीवन-दर्शन से जोड़ते हैं। कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस आयोजन के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित कर रहा है।
एचआईवी/एड्स जागरूकता कार्यक्रम
कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड एंड ऑनर्स स्टडीज में युवा रेड क्रॉस और रेड रिबन क्लब का अभिमुखीकरण तथा एचआईवी/एड्स जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में 100 से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। प्राचार्या प्रो. रीटा ने कहा कि युवाओं में सामाजिक सरोकार और सेवा भावना विकसित करना समय की आवश्यकता है।
हरियाणवी लोक संगीत कार्यशाला शुरू
संगीत एवं नृत्य विभाग में हरियाणवी लोक संगीत विषय पर तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन संगीत एवं नृत्य विभाग, भारत रत्न श्री गुलजारी लाल नंदा नीतिशास्त्र-दर्शनशास्त्र केंद्र तथा कला एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग, हरियाणा सरकार के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। कार्यशाला का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन से हुआ। विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया।



