न्यूयॉर्क और म्यूनिख मंच पर जयशंकर के बयान: आतंकवाद, व्यापार और अमेरिकी रणनीति पर भारत की सार्वजनिक असहमति

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सितंबर और अक्टूबर 2026 में विदेश और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका से जुड़े आतंकवाद, व्यापार और वैश्विक रणनीति के मुद्दों पर खुलकर असहमति जताई है। ये बयान भारत की उस कूटनीतिक शैली का संकेत देते हैं, जिसमें नई दिल्ली अपने हितों पर अंतर अब सार्वजनिक रूप से रख रही है, लेकिन इन्हें किसी औपचारिक टकराव या संबंध-विच्छेद के रूप में नहीं देखा जा रहा।
न्यूयॉर्क में आतंकवाद और व्यापार पर सीधी बात
29 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी के कार्यक्रम में जयशंकर ने कहा कि भारत दशकों से एक पड़ोसी देश की जानबूझकर अपनाई गई नीति के तहत आतंकवाद का सामना करता रहा है। उन्होंने कहा कि अगर कोई साझेदार भारत की इस प्रमुख चिंता को पर्याप्त समझ, कद्र या सहानुभूति के साथ नहीं देखता, तो इसका असर द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ता है। संदर्भ अमेरिका की हालिया पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकी और भारत की सुरक्षा चिंताओं से जुड़ा था।
उसी कार्यक्रम में उन्होंने व्यापार नीति को भी रेखांकित किया। जयशंकर के अनुसार, देश इतने आत्म-केंद्रित नहीं हो सकते कि अपने फैसले लेकर कह दें कि दूसरे की मुश्किलें उनका इरादा नहीं थीं। भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में पिछले वर्ष “उतार-चढ़ाव” रहे। अमेरिकी सेक्शन 301 प्रक्रिया अभी जारी है और समझौता लगभग अंतिम चरण में होने के बावजूद टैरिफ ढांचे में बदलाव के कारण बातचीत लंबी चली। 2025 में दोनों देशों का वस्तु व्यापार करीब 149.1 अरब डॉलर रहा, जिसमें भारत का माल अधिशेष लगभग 58.4 अरब डॉलर था।
इसी दौरे के दौरान 23 सितंबर को जयशंकर की अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात हुई। बैठक में रणनीतिक साझेदारी, खाड़ी और यूक्रेन की स्थिति के साथ रूस-ईरान प्रतिबंध अधिनियम (SRIA) पर भारत की चिंताओं को रखा गया। इस कानून के तहत रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर ऊंचे टैरिफ की संभावना जताई गई है।
म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में अमेरिकी रणनीति पर टिप्पणी
4 अक्टूबर 2026 को म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में जयशंकर ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य मुख्य रूप से अमेरिका की “कट्टरपंथी पुनर्स्थापना” से चिह्नित है। उन्होंने इसे “पसंद की मुद्रा” बताया और कहा कि अमेरिका जानबूझकर एक “अकेला शक्ति” बन गया है। उन्होंने चीन के उदय को दूसरे बड़े कारक के रूप में रखा और कहा कि चीन वैश्विक विनिर्माण का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रखता है, जिससे उसका आर्थिक वजन राजनीतिक प्रभाव में बदल रहा है।
जयशंकर ने यह भी कहा कि वाशिंगटन और बीजिंग के बीच प्रतिस्पर्धा अब इन दोनों तक सीमित नहीं रही। देश अपने आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक लाभ को लीवरेज के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने भारत-रूस संबंधों को “सकारात्मक और लगातार सकारात्मक” बताया, जबकि स्वीकार किया कि यह रिश्ता दशकों में बदला है। रूसी तेल की खरीद अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों की आलोचना का विषय बनी हुई है।
पहले के बयान और नीति की निरंतरता
जून 2026 में फिनलैंड के कुल्टारांटा टॉक्स में जयशंकर ने रूसी तेल पर पश्चिमी रुख को दोहरा मानक बताया था। उन्होंने कहा कि प्रतिबंध या टैरिफ तब लगाए और हटाए जाते हैं जब यह उनके हित में हो। उनके अनुसार, पहले अमेरिका ने वैश्विक ऊर्जा बाजार स्थिर रखने के लिए भारत से रूसी तेल खरीदने को कहा था, और बाद में उसी खरीद पर टैरिफ लगाए गए।
इन बयानों से पहले भारत मतभेदों को ज्यादातर बंद कमरों में रखता था। राजनयिक विश्लेषणों में इसे बदलाव माना गया है कि अब मित्र देश के साथ भी मूल चिंताओं पर सार्वजनिक रूप से बात रखी जा रही है। साथ ही व्यापार वार्ता जारी है और दोनों पक्ष संबंध सुधार की बात भी कर रहे हैं।
व्याख्या और सीमा
जयशंकर के हालिया बयान आतंकवाद, टैरिफ, रूसी ऊर्जा और अमेरिकी रणनीतिक पुनर्संरेखण पर भारत की असहमति को दर्ज करते हैं। ये भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय व्यवस्था में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश से मेल खाते हैं। हालांकि इन्हें संबंधों के पूर्ण टूटने या एकतरफा “सुना देने” के रूप में पढ़ना अतिशयोक्ति होगी। आधिकारिक बैठकें, व्यापार समझौते की रूपरेखा और साझेदारी की भाषा समानांतर चल रही है।
तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि विदेश और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जयशंकर के ये बयान भारत की अधिक मुखर कूटनीति का हिस्सा हैं, जिसमें सुरक्षा और आर्थिक हितों को साझेदारों के सामने भी स्पष्ट रखा जा रहा है।



