छत्तीसगढ़

सुसाइड नोट में नाम होना ही आत्महत्या के लिए उकसाने का सबूत नहीं

हाईकोर्ट ने आरोपी की रिहाई बरकरार रखी

छत्तीसगढ़ संवाददाता

बिलासपुर, 11 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सुसाइड नोट या डायरी में किसी व्यक्ति का नाम लिखे होने भर से उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए प्रत्यक्ष उकसावे या आपराधिक मंशा से जुड़े पर्याप्त साक्ष्य जरूरी हैं। कोर्ट ने आत्महत्या के मामले में आरोपी साले को आरोपमुक्त करने के सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने 26 सितंबर को यह फैसला सुनाया। मामला 3 जुलाई 2017 का है, जब राजनांदगांव जिले में बरगा क्रॉसिंग के पास रेलवे ट्रैक पर एक व्यक्ति का शव मिला था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक की पत्नी के भाई पर उसे प्रताड़ित करने, दहेज के मामले में फंसाने की धमकी देने और घर छोड़ने के लिए मजबूर करने के आरोप थे। पुलिस को मिली डायरी में मृतक ने आत्महत्या के लिए आरोपी को जिम्मेदार ठहराया था।

राजनांदगांव के सत्र न्यायालय ने सितंबर 2021 में आरोपी को आरोपमुक्त कर दिया था। राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 306 और 107 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित करने के लिए केवल नाम का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। गवाहों के बयानों से कथित प्रताड़ना का समय और मृत्यु से ठीक पहले उकसावे की कोई ऐसी घटना सामने नहीं आई, जो आरोप को पुष्ट कर सके।

कोर्ट ने माना कि वैवाहिक तनाव और पारिवारिक विवाद अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध स्थापित नहीं करते। इसके लिए आपराधिक मंशा और उकसावे से जुड़े साक्ष्य आवश्यक हैं। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी को आरोपमुक्त करने के सत्र न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

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