आदिवासी जमीन के हस्तांतरण पर शहरी और नजूल क्षेत्र की छूट नहीं- हाईकोर्ट

कोंडागांव के मामले में खरीदारों की याचिका खारिज
छत्तीसगढ़ संवाददाता
बिलासपुर, 5 नवंबर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आदिवासी जमीन गैर-आदिवासी को हस्तांतरित करने के मामले में जमीन का नगरपालिका क्षेत्र या नजूल भूमि होना कानूनी प्रतिबंधों से छूट का आधार नहीं है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने कोंडागांव की जमीन से जुड़े मामले में खरीदारों की याचिका खारिज कर दी।
मामला कोंडागांव नगरपालिका क्षेत्र के खसरा नंबर 423 की 0.17 एकड़ जमीन का है। गजेंद्र ध्रुव ने 4 नवंबर 2016 को भू-राजस्व संहिता की धारा 170-बी के तहत जमीन का कब्जा वापस दिलाने की मांग की थी। उनका दावा था कि जमीन 1934-35 से उनके पूर्वजों के नाम दर्ज थी और दूसरे पक्ष ने अवैध कब्जा किया।
खरीदारों का कहना था कि उनके पिता केवलचंद ने 23 जनवरी 1960 को शंभूनाथ से करीब 12 डिसमिल जमीन पंजीकृत विक्रय पत्र से खरीदी थी। बाकी जमीन 3 दिसंबर 1974 को श्यामलाल को बेची गई थी। उन्होंने लंबे समय से वहां मकान में रहने और जमीन नजूल होने का हवाला दिया।
एसडीओ ने 13 अक्टूबर 2017 को आवेदन खारिज किया था। कलेक्टर ने 9 जुलाई 2020 को यह आदेश निरस्त किया और संभागायुक्त ने 5 अक्टूबर 2021 को खरीदारों की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 165(6) के तहत आदिवासी भूमि के गैर-आदिवासी को हस्तांतरण के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति जरूरी है। नगरपालिका या नजूल क्षेत्र होने से यह प्रतिबंध समाप्त नहीं होता। खरीदारों ने भी अनुमति नहीं लेने की बात स्वीकार की थी।
दशकों की देरी पर अदालत ने विचार किया, लेकिन खरीदार राजस्व अधिकारियों के आदेशों में हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं बता सके। पंजीकृत विक्रय पत्र वैधानिक अनुमति का विकल्प नहीं हो सकता।



