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पूर्व जजों की राय: क्या सुप्रीम कोर्ट को SIR प्रक्रिया की दोबारा समीक्षा करनी चाहिए?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देश में बहस जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में इस प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया था। इसके बावजूद दो पूर्व न्यायाधीशों ने एक टेलीविजन चर्चा में कहा है कि अदालत को मतदान के अधिकार की रक्षा के लिए प्रक्रिया की दोबारा समीक्षा करनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का मई 2026 का फैसला

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने 27 मई 2026 को चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए की गई है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हटाने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं है। चुनाव आयोग केवल चुनावी पात्रता की सीमित जांच कर सकता है। नागरिकता का अंतिम फैसला सक्षम प्राधिकारी ही करेगा। जिन नामों को 2003 की सूची से हटाया गया, उनके मामले चार सप्ताह में नागरिकता अधिनियम के तहत भेजने का निर्देश भी दिया गया था।

पश्चिम बंगाल में न्यायिक निगरानी

पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच विश्वास की कमी देखकर सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में जिला न्यायाधीश स्तर के सेवारत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को दावों और आपत्तियों के निपटारे में लगाया। बाद में अपीलों के लिए पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीशों का न्यायाधिकरण बनाने का आदेश भी दिया गया।

हालिया सुनवाई में अदालत ने उपचुनावों से पहले लंबित अपीलों की सुनवाई तेज करने की मांग पर तुरंत हस्तक्षेप करने से इनकार किया। बड़ी संख्या में अपीलें अभी भी लंबित बताई जा रही हैं।

पूर्व जजों ने क्या कहा

एक मीडिया चैनल के जजेज पैनल में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता और पूर्व उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव बनर्जी शामिल हुए। चर्चा का मुख्य सवाल था कि क्या सुप्रीम कोर्ट को SIR प्रक्रिया में दोबारा दखल देकर उसकी व्यापक समीक्षा करनी चाहिए।

दोनों पूर्व जजों ने मतदान के अधिकार को लोकतंत्र की आधारशिला बताया। उन्होंने कहा कि संविधान के तहत हर नागरिक को वोट देने का अधिकार है, जब तक वह अयोग्य न घोषित हो। मतदाताओं पर अपने दस्तावेज साबित करने का बोझ और बड़े पैमाने पर नाम हटने की शिकायतों को देखते हुए अदालतों को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

उन्होंने चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाए। उनका मानना था कि पारदर्शिता बढ़ाने और गलत तरीके से बाहर किए गए नागरिकों को राहत देने के लिए न्यायिक निगरानी जारी रहनी चाहिए।

चुनाव आयोग का पक्ष

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR मतदाता सूची की शुद्धता के लिए जरूरी है। आयोग का दावा है कि पर्याप्त प्रक्रियागत सुरक्षा उपाय हैं, दावे-आपत्तियां दाखिल करने का मौका दिया गया और अपील का अधिकार मौजूद है। आयोग ने हालिया रिपोर्टों में दो आयुक्तों की आपत्तियों को सामान्य आंतरिक चर्चा बताया है।

मौजूदा स्थिति

SIR कई राज्यों में पूरा हो चुका है या चल रहा है। ड्राफ्ट सूची से बड़ी संख्या में नाम हटे, लेकिन अंतिम सूची में दावों के बाद कुछ नाम वापस जोड़े गए। नागरिकता संबंधी मामलों को सक्षम अधिकारियों के पास भेजने का निर्देश अभी लागू है।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही प्रक्रिया को वैध मान चुका है, लेकिन कार्यान्वयन में पारदर्शिता, लंबित अपीलें और मतदान के अधिकार की व्यावहारिक सुरक्षा जैसे मुद्दे अभी भी चर्चा में हैं। पूर्व जजों की राय इन्हीं बिंदुओं पर केंद्रित है।

आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की अपीलों और अन्य राज्यों में SIR के अंतिम चरण पर अदालत की नजर बनी रह सकती है।

अजय यादव

एक सीधे-सादे स्वभाव के व्यक्ति हैं। बचपन से ही अपने आसपास की बातों को याद रखने की आदत रही। परिवार में बड़ों का आदर और मेहनत की सीख मिली। वे सड़कों पर घूमना, बस-स्टैंड और बाजार की हलचल देखना पसंद करते हैं। उन्हें लगता है कि असली तस्वीर वही है जो आम दिन में दिखती है, किसी मंच पर नहीं।

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