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गांधी व्यक्तिगत घृणा नहीं करते थे, लेकिन टकराने में पीछे नहीं हटते थे: आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत ने कहा है कि महात्मा गांधी व्यक्तिगत रूप से किसी से घृणा नहीं करते थे, लेकिन अन्याय के सामने खड़े होकर टकराने में उनका कोई सानी नहीं था। वे हिंसक नहीं थे, फिर भी पीछे नहीं हटते थे और केवल अंग्रेज़ों से नहीं, जिन्ना और कांग्रेस से भी भिड़े।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित अपने लेख में आचार्य प्रशांत ने गांधी जयंती के संदर्भ में लिखा कि 2 अक्टूबर को गांधी की 157वीं जयंती थी, जिसे संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाता है। उनके अनुसार, गांधी की अहिंसा कमज़ोरी या पीछे हटने का नाम नहीं थी। वे सामने डट जाते थे और अपनी बात पर अड़ जाते थे।

इतिहास में गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना के मतभेद दर्ज हैं। दोनों शुरुआत में कांग्रेस से जुड़े रहे, लेकिन 1920 के दशक में असहयोग आंदोलन और होम रूल लीग को लेकर उनके रास्ते अलग हो गए। 1944 में बंबई में दोनों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, जो बिना किसी समझौते के खत्म हुई। गांधी भारत के विभाजन के विरोधी रहे और उसे पाप बताते रहे, जबकि जिन्ना पाकिस्तान की मांग पर अड़े रहे। 1947 में भी गांधी विभाजन को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे, जबकि कांग्रेस नेतृत्व ने उसे मान लिया था।

कांग्रेस से भी गांधी के कई टकराव हुए। 1934 में उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ दी, हालांकि उनके प्रभाव पर इसका असर नहीं पड़ा। सुभाष चंद्र बोस के साथ त्रिपुरी अधिवेशन को लेकर मतभेद सार्वजनिक रहे। नेहरू और पटेल समेत कई साथी कई मुद्दों पर उनसे सहमत नहीं थे। विभाजन के समय भी गांधी का रुख कांग्रेस के बहुमत से अलग रहा। वे स्वतंत्रता समारोह में शामिल नहीं हुए और सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ उपवास व नोआखाली जैसी जगहों पर मौजूदगी से अपना विरोध जताते रहे।

आचार्य प्रशांत लिखते हैं कि गांधी बहुत बार जनता के सामने भी अड़ जाते थे। दंगा होता तो वे लोगों के सामने खड़े होकर हिंसा रोकने की बात करते थे। उनकी लड़ाई व्यक्ति से नहीं, उस व्यवस्था या सोच से थी जिसे वे गलत मानते थे। व्यक्तिगत घृणा उनके तरीके का हिस्सा नहीं थी, लेकिन समझौता भी नहीं था।

यह आकलन आचार्य प्रशांत का है। गांधी की अहिंसा और उनके राजनीतिक टकराव ऐतिहासिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं, जबकि उनके इरादों और प्रभाव की व्याख्या अलग-अलग रही है।

राजेश कुमार

उत्तर भारत के एक छोटे शहर में पले-बढ़े। बचपन से ही लोगों की बातें सुनना और आसपास की ज़िंदगी को ध्यान से देखना उनकी आदत रही है। परिवार में सादगी और मेहनत को हमेशा महत्व दिया गया। खाली समय में किताबें पढ़ना, पुरानी डायरियाँ पलटना और सड़क किनारे चाय की दुकान पर बैठकर आम लोगों से बात करना उन्हें अच्छा लगता है। वे मानते हैं कि हर इंसान की अपनी एक कहानी होती है, बस उसे सुनने वाला कोई होना चाहिए।

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