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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, SIR के लिए बदले गए फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी; रिकॉर्ड पर देखेंगे किसने संशोधन किया

नई दिल्ली, 5 अक्टूबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल हो रहे संशोधित फॉर्म-6 को अदालत ने मंजूरी नहीं दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि रिकॉर्ड पेश होने पर यह देखा जाएगा कि फॉर्म में बदलाव किसने किया।

यह टिप्पणी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान हुई। पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। सुनवाई अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका पर हो रही थी, जिसमें चुनाव आयोग के कुछ फैसलों को एकतरफा बताकर कार्रवाई की मांग की गई है।

कोर्ट ने क्या कहा

सुनवाई के दौरान जब फॉर्म-6 में किए गए बदलाव का जिक्र हुआ, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “किसी भी संशोधित फॉर्म-6 को हमने मंजूरी नहीं दी है। यह स्पष्ट है। जब रिकॉर्ड पेश होगा, तो हम देखना चाहेंगे कि इसे किसने संशोधित किया।” अदालत ने संकेत दिया कि संबंधित रिकॉर्ड आने के बाद इस बात की जांच की जाएगी कि बदलाव किस स्तर पर और किसके निर्देश पर किया गया।

यह मौखिक टिप्पणी है। अदालत ने इस मुद्दे पर अभी कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। मामले की आगे सुनवाई जारी है।

फॉर्म-6 में क्या बदलाव बताया गया

फॉर्म-6 वह आवेदन है, जिसके जरिए नया मतदाता अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए आवेदन करता है। याचिकाकर्ताओं और रिपोर्टों के अनुसार, SIR प्रक्रिया के दौरान ऑनलाइन फॉर्म-6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई। इसके तहत आवेदक को यह बताना है कि उसका या उसके माता-पिता का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं। कुछ रिपोर्टों में दादा-दादी या नाना-नानी के नाम का भी उल्लेख है।

याचिका में कहा गया है कि यह अतिरिक्त शर्त वैधानिक फॉर्म का हिस्सा नहीं थी और इसे रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 में संशोधन के बिना नहीं जोड़ा जा सकता। दलील यह भी दी गई कि बदलाव से पहली बार मतदाता बनने वाले युवा आवेदकों को परेशानी हो सकती है, खासकर तब जब परिवार का नाम पुरानी सूची में न हो।

चुनाव आयोग के दावे से अलग टिप्पणी

यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को जारी एक प्रेस नोट में कहा था कि SIR के लिए फॉर्म-6 के साथ जोड़ा गया घोषणा-पत्र सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। आयोग का कहना था कि गैर-SIR अवधि में रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म का इस्तेमाल होगा।

अदालत ने साफ किया कि मई के बिहार SIR संबंधी फैसले में SIR की रूपरेखा को बरकरार रखा गया था, लेकिन संशोधित फॉर्म-6 पर उस फैसले में विचार नहीं हुआ था, क्योंकि यह बदलाव बाद में लागू हुआ। इसलिए आयोग का यह दावा कि संशोधित फॉर्म को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी प्राप्त है, अदालत की सोमवार की टिप्पणी से मेल नहीं खाता।

आयोग के अंदर भी आपत्ति का जिक्र

सुनवाई और पहले की रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि फॉर्म में अतिरिक्त घोषणा को लेकर चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की थी। उनकी दलील थी कि वैधानिक फॉर्म में ऐसा बदलाव केंद्र सरकार द्वारा नियमों में संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता। याचिका में आरोप है कि जुलाई 2026 में ईसीआईनेट पोर्टल पर फॉर्म को डिजिटल रूप से बदला गया और बाद में एक आयुक्त ने इसे अनधिकृत बताते हुए वापस लेने की बात कही।

चुनाव आयोग का पक्ष रहा है कि अतिरिक्त घोषणा केवल SIR अवधि के लिए है और वैधानिक फॉर्म-6 को नियमों के तहत बदला नहीं गया है। अदालत ने अब रिकॉर्ड मंगाने का संकेत दिया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि संशोधन किसने और किस प्रक्रिया से किया।

यह मामला चल रहा है। आगे की सुनवाई में चुनाव आयोग का जवाब और संबंधित रिकॉर्ड आने के बाद अदालत इस मुद्दे पर और स्पष्ट रुख अपना सकती है।

राजेश कुमार

उत्तर भारत के एक छोटे शहर में पले-बढ़े। बचपन से ही लोगों की बातें सुनना और आसपास की ज़िंदगी को ध्यान से देखना उनकी आदत रही है। परिवार में सादगी और मेहनत को हमेशा महत्व दिया गया। खाली समय में किताबें पढ़ना, पुरानी डायरियाँ पलटना और सड़क किनारे चाय की दुकान पर बैठकर आम लोगों से बात करना उन्हें अच्छा लगता है। वे मानते हैं कि हर इंसान की अपनी एक कहानी होती है, बस उसे सुनने वाला कोई होना चाहिए।

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