अरुण-तोखन के अपने ही शहर बिलासपुर की सड़कें बदहाल, आखिर जनता के गड्ढों भरे सफर की जिम्मेदारी कौन लेगा?

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर की पहचान कभी बेहतर सड़कों और तेजी से विकसित होते शहर के रूप में होती थी। पूर्ववर्ती 15 वर्षों की डॉ. रमन सिंह सरकार के दौरान बिलासपुर नगर विधायक अमर अग्रवाल के कार्यकाल में शहर की सड़कों की स्थिति को लेकर जिस तरह का दावा किया जाता था, आज उसी बिलासपुर की सड़कों की हालत देखकर सवाल उठना लाजिमी है। आखिर ऐसा क्या हो गया कि वर्तमान विष्णुदेव साय सरकार के कार्यकाल में न्यायधानी की सड़कें जगह-जगह गड्ढों में तब्दील होती जा रही हैं?सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिलासपुर शहर से राजनीतिक और व्यक्तिगत जुड़ाव रखने वाले प्रदेश के उप मुख्यमंत्री अरुण साव, जो बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र के पूर्व सांसद भी रह चुके हैं, और बिलासपुर के पूर्व सांसद एवं वर्तमान केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू के रहते शहर की सड़कों की यह दुर्दशा क्यों है? क्या इन जनप्रतिनिधियों को शहर की बदहाल सड़कों की जानकारी नहीं है, या फिर जनता की रोजमर्रा की परेशानियां उनकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं हैं?तिफरा ओवरब्रिज की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। यहां दर्जनों गड्ढे वाहन चालकों के लिए मुसीबत बने हुए हैं। दोपहिया वाहन चालक जान जोखिम में डालकर आवागमन करने को मजबूर हैं। वहीं हाईटेक बस स्टैंड तक पहुंचने वाली सड़क की हालत भी बेहद खराब बताई जा रही है। तालापारा चौक से मरीमाई मार्ग, विद्या नगर, विनोबा नगर, सरकंडा सहित शहर के अनेक इलाकों में सड़कों की बदहाली नागरिकों के लिए रोजाना परेशानी का सबब बन चुकी है।विडंबना देखिए कि जिस बिलासपुर को स्मार्ट सिटी और विकास के बड़े-बड़े दावों के साथ प्रस्तुत किया जाता है, उसी शहर में नागरिकों को गड्ढों से भरी सड़कों पर सफर करना पड़ रहा है। बारिश हो या सामान्य मौसम, सड़क पर बने गड्ढे दुर्घटनाओं को आमंत्रित कर रहे हैं। वाहन चालकों की गाड़ियां क्षतिग्रस्त हो रही हैं, वहीं आम नागरिकों को धूल, कीचड़ और जाम जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।अब सवाल सिर्फ नगर निगम या लोक निर्माण विभाग की जिम्मेदारी का नहीं है, बल्कि उन जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का भी है, जिनके कंधों पर बिलासपुर के विकास की जिम्मेदारी है। जब शहर के प्रमुख मार्गों की यह हालत है तो अंदरूनी बस्तियों और वार्डों की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।डॉ. रमन सिंह के 15 साल के शासनकाल और अमर अग्रवाल के विधायक रहते शहर की सड़कों की स्थिति से आज की बदहाली की तुलना करते हुए नागरिक यह पूछ रहे हैं कि आखिर विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच इतनी बड़ी खाई क्यों पैदा हो गई? सत्ता में भाजपा है, प्रदेश में भाजपा की सरकार है, शहर के विकास से जुड़े प्रमुख पदों पर भाजपा के जनप्रतिनिधि हैं, फिर भी बिलासपुर की सड़कें अपनी बदहाली पर आंसू क्यों बहा रही हैं?अब जनता को आश्वासन नहीं, जवाब चाहिए। उप मुख्यमंत्री अरुण साव और केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू बताएं कि बिलासपुर की जर्जर सड़कों को दुरुस्त कराने के लिए अब तक ठोस पहल क्यों नजर नहीं आ रही है? संबंधित विभागों के जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही कब तय होगी? तिफरा ओवरब्रिज सहित शहर के प्रमुख मार्गों का स्थायी मरम्मत कार्य आखिर कब शुरू होगा?न्यायधानी की जनता को राजनीतिक भाषण, विकास के विज्ञापन और आश्वासनों से ज्यादा सुरक्षित और गड्ढामुक्त सड़कें चाहिए। आखिर बिलासपुर की जनता ने क्या यही दिन देखने के लिए अपने जनप्रतिनिधियों को चुना था? अगर अपने ही शहर की सड़कें नहीं संभल पा रहीं तो विकास के बड़े-बड़े दावों का औचित्य क्या है?

