गोरक्षपीठ में बुधवार को महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा, सीएम योगी करेंगे पूज्य गुरुदेव को नमन

गोरखपुर। गोरक्षपीठ में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में चल रहा साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह बुधवार, 30 सितंबर को संपन्न होगा। आश्विन कृष्ण चतुर्थी के दिन गोरक्षपीठाधीश्वर एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।
कार्यक्रम गोरखनाथ मंदिर स्थित महंत दिग्विजयनाथ स्मृति सभागार में आयोजित होगा। इसमें देशभर के साधु-संत और धर्माचार्य शामिल होने वाले हैं। मंदिर प्रशासन के अनुसार सप्त दिवसीय समारोह 24 से 30 सितंबर तक चला है। 29 सितंबर को महंत दिग्विजयनाथ जी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा हो चुकी है। 29 और 30 सितंबर को अखंड मानस पाठ और भंडारा भी आयोजित है।
राम मंदिर आंदोलन और सामाजिक समरसता से जुड़ा जीवन
ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ का जीवन धार्मिक सेवा, सामाजिक समरसता और श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण से जुड़ा रहा। वे श्रीराम मंदिर आंदोलन के प्रमुख संत नेताओं में गिने जाते हैं। नाथपंथ की लोककल्याणकारी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने धार्मिक-सामाजिक कार्यों के साथ राजनीति में भी भूमिका निभाई।
वे पांच बार मनीराम विधानसभा और चार बार गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए। 1962, 1967, 1969, 1974 और 1977 में वे मनीराम से विधायक रहे। इसके बाद 1970, 1989, 1991 और 1996 में गोरखपुर से सांसद चुने गए। वे अखिल भारतीय हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष और महासचिव भी रहे।
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को गोरक्षपीठ की तीन पीढ़ियों से जोड़ा जाता है। महंत दिग्विजयनाथ जी के बाद यह कार्य महंत अवेद्यनाथ जी ने आगे बढ़ाया। नब्बे के दशक में उनके नेतृत्व में आंदोलन का दायरा बढ़ा। 21 जुलाई 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ और वे सर्वसम्मति से इसके अध्यक्ष चुने गए। वे जीवनभर इस समिति के अध्यक्ष रहे। बाद में श्रीराम जन्मभूमि निर्माण उच्चाधिकार समिति से भी वे जुड़े रहे। मंदिर निर्माण आगे चलकर उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री रहते हुए पूरा हुआ।
छुआछूत के खिलाफ अभियान और शिक्षा का विस्तार
महंत अवेद्यनाथ ने हिंदू समाज में छुआछूत और जातिगत भेदभाव दूर करने पर जोर दिया। अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बारहपंथ योगी महासभा के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संतों को भी इस कार्य से जोड़ा। दक्षिण भारत के मीनाक्षीपुरम में हुए सामूहिक धर्मांतरण की घटना के बाद उन्होंने सामाजिक कुरीतियों और विभाजन के खिलाफ अभियान तेज किया।
उन्होंने दलित बस्तियों में सहभोज की परंपरा शुरू की। काशी में डोमराजा के घर संतों के साथ भोजन कर समरसता का संदेश दिया। राम मंदिर भूमिपूजन के दौरान दलित कामेश्वर चौपाल के हाथों पहली शिला रखवाने को भी इसी सोच से जोड़ा जाता है।
नाथपंथ के अध्येता डॉ. प्रदीप कुमार राव के अनुसार महंत अवेद्यनाथ सामाजिक एकता का संदेश श्रीराम और देवी दुर्गा के प्रसंगों से देते थे। वे शबरी, निषादराज, जटायु और वनवासियों से जुड़े रामकथा प्रसंगों का उल्लेख करते थे। देवी दुर्गा की आठ भुजाओं का उदाहरण देकर वे चारों वर्णों की एकता को सामूहिक शक्ति बताते थे।
शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने गुरु महंत दिग्विजयनाथ जी के कार्यों को आगे बढ़ाया। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अंतर्गत प्राथमिक से उच्च शिक्षा, तकनीकी और चिकित्सा संस्थान संचालित हुए।
जीवन परिचय
महंत अवेद्यनाथ का जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कांडी ग्राम में हुआ था। अधिकांश उपलब्ध विवरणों के अनुसार जन्म तिथि 28 मई 1921 है, जबकि कुछ स्मृति ग्रंथों में 18 मई 1919 का उल्लेख भी मिलता है। बचपन का नाम कृपाल सिंह बिष्ट था। 8 फरवरी 1942 को गोरक्षपीठ में महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज से विधिवत दीक्षा ली। 1969 में गुरु की चिरसमाधि के बाद 29 सितंबर को वे गोरखनाथ मंदिर के महंत और पीठाधीश्वर बने। 12 सितंबर 2014 को गोरखपुर में उनका निधन हुआ। पुण्यतिथि मंदिर परंपरा के अनुसार आश्विन कृष्ण चतुर्थी पर मनाई जाती है।
बुधवार की श्रद्धांजलि सभा में उनके धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक योगदान का स्मरण किया जाएगा।



