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4 अक्टूबर 1977: जब अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित किया

4 अक्टूबर 1977 को तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 32वें अधिवेशन को हिंदी में संबोधित किया। यह मौका उनके लिए महासभा का पहला संबोधन था और भारतीय नेतृत्व की ओर से महासभा में हिंदी में दिया गया पहला भाषण माना जाता है। उस समय वे मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री थे।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में तब तक भारत के प्रतिनिधि आमतौर पर अंग्रेजी में बोलते रहे थे। वाजपेयी अंग्रेजी में भी धाराप्रवाह थे, फिर भी उन्होंने जानबूझकर हिंदी को चुना। उनके इस फैसले को भारत की भाषाई पहचान को वैश्विक मंच पर रखने के रूप में याद किया जाता है। आकाशवाणी और प्रसार भारती के अभिलेखागार में यह संबोधन हिंदी भाषण के रूप में सुरक्षित है।

कौन थे तब वाजपेयी

1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने वाजपेयी को विदेश मंत्रालय सौंपा। महासभा में बोलते हुए उन्होंने खुद को संयुक्त राष्ट्र का नया व्यक्ति बताया, लेकिन यह भी कहा कि भारत नया नहीं है, क्योंकि वह संगठन की स्थापना से ही उससे जुड़ा रहा है। बाद में वे तीन बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन 1977 का यह भाषण उनके विदेश मंत्री काल का है।

भाषण में क्या कहा

वाजपेयी ने भाषण की शुरुआत भारत की जनता की ओर से राष्ट्रसंघ के लिए शुभकामना संदेश से की। उन्होंने महासभा के 32वें अधिवेशन पर संयुक्त राष्ट्र में भारत की आस्था दोहराई और कहा कि जनता सरकार को सत्ता संभाले कुछ ही महीने हुए हैं।

उन्होंने भारतीय चिंतन की पुरानी धारणा वसुधैव कुटुंबकम का उल्लेख किया और कहा कि भारत दुनिया को एक परिवार मानता आया है। शीत युद्ध के दौर में उन्होंने गुटनिरपेक्षता का पक्ष रखा और कहा कि भारत किसी गुट का नहीं है, बल्कि सभी देशों के साथ समानता और मित्रता चाहता है।

भाषण में परमाणु निरस्त्रीकरण, दक्षिणी अफ्रीका में रंगभेद और उपनिवेशवाद, पश्चिम एशिया की स्थिति तथा पाकिस्तान के साथ संबंधों के सामान्यीकरण जैसे मुद्दे भी आए। उन्होंने आपातकाल के बाद भारत में लोकतंत्र और बुनियादी स्वतंत्रता की बहाली का भरोसा दिलाया तथा कहा कि ऐसी स्वतंत्रता का हनन फिर न हो, इसके लिए संवैधानिक उपाय किए जा रहे हैं।

क्यों याद किया जाता है यह दिन

इस संबोधन को इसलिए ऐतिहासिक माना जाता है क्योंकि इससे पहले किसी भारतीय नेता ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित नहीं किया था। कई समकालीन रिपोर्टों और बाद के अभिलेखों में इसे महासभा के मंच पर हिंदी की पहली गूंज भी कहा गया है। वाजपेयी बाद के वर्षों में भी संयुक्त राष्ट्र में कई बार बोले और हिंदी में बोलने का सिलसिला जारी रखा।

4 अक्टूबर इसलिए भारतीय कूटनीति और हिंदी दोनों के इतिहास की तारीख बन गई। उस दिन न्यूयॉर्क की महासभा में भारत का पक्ष एक ऐसे नेता ने रखा, जो संसद में लंबे समय से सक्रिय रहे थे और जिन्हें अपनी वाक्पटुता के लिए जाना जाता था।

अनीता शर्मा

एक संवेदनशील और शांत स्वभाव की महिला हैं। घर-परिवार के बीच रहकर उन्होंने ज़िंदगी के छोटे-छोटे पड़ावों को करीब से देखा है। उन्हें सुबह की सैर, घर के आंगन में बैठकर चाय पीना और पुरानी पत्रिकाएँ पढ़ना पसंद है। वे आसपास के लोगों के सुख-दुख को दिल से महसूस करती हैं। उनकी सोच साफ और सीधी है — जो दिखे, वही कहें, बिना बढ़ा-चढ़ाए।

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