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दाढ़ी की अनुमति वापस लेने के बाद वीआरएस का आरोप: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने बीएसएफ जवान की याचिका क्षेत्राधिकार के अभाव में खारिज की

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के एक जवान की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने दाढ़ी रखने की अनुमति वापस लिए जाने के बाद दबाव में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेने का आरोप लगाया था। अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी और कहा कि विवाद उसके प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र से बाहर पैदा हुआ।

न्यायमूर्ति राजनेश ओसवाल की एकल पीठ ने 30 सितंबर को याचिकाकर्ता खुर्शीद अहमद खान की अर्जी खारिज करते हुए उन्हें उचित क्षेत्राधिकार वाली अदालत में जाने की छूट दी। खान ने 16 जून 2023 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत 50 बटालियन बीएसएफ, प्रहारिनगर, तुरा (मेघालय) के कमांडेंट ने उनकी वीआरएस मंजूर कर उन्हें उसी दिन यूनिट की ताकत से बाहर कर दिया था।

क्या है मामला

याचिका के अनुसार, खान मार्च 1998 में बीएसएफ में भर्ती हुए थे। 6 जनवरी 2018 को उन्हें साफ-सुथरी और कटी हुई दाढ़ी रखने की अनुमति दी गई थी। उनका कहना है कि 16 जून 2023 को यह अनुमति अचानक वापस ले ली गई, जिसके बाद वे विवश होकर उसी दिन वीआरएस के लिए आवेदन करने पर मजबूर हुए। आवेदन उसी दिन स्वीकार कर लिया गया।

खान ने अगले दिन, 17 जून 2023 को, वीआरएस आवेदन वापस लेने का अनुरोध किया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। 5 जुलाई 2023 के आदेश में उन्हें पेंशन लेने और ड्यूटी पर न लौटने को कहा गया। उन्होंने बाद में महानिदेशक, बीएसएफ को भी अभ्यावेदन दिया, जिस पर उनके अनुसार विचार नहीं हुआ। उनका दावा है कि अनुमति रद्द करना प्रतिशोधपूर्ण था और सेवानिवृत्ति दबाव में ली गई।

बीएसएफ का पक्ष

बीएसएफ ने इन आरोपों से इनकार किया है। बल के अनुसार, 16 जून 2023 को खान को बेतरतीब पोशाक और लंबी, बिना काटी दाढ़ी के साथ पाया गया, जो पहले दी गई अनुमति और बल के नियमों के खिलाफ था। उनसे दाढ़ी कटवाने को कहा गया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया, जिसके बाद अनुमति रद्द की गई।

बल का कहना है कि परेड के बाद खान ने स्वयं वीआरएस की इच्छा जताई और आवेदन दिया। कमांडेंट ने अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में उनसे पूछा कि क्या फैसला किसी दबाव में लिया गया है। बीएसएफ के मुताबिक, खान ने दबाव से इनकार किया और यह बात रजिस्टर में दर्ज की गई। उन्होंने मां की बीमारी और अपनी मेडिकल श्रेणी के कारण कठिन सेवा स्थितियां न झेल पाने का कारण भी बताया था। सक्षम प्राधिकारी ने सेवा रिकॉर्ड और हालिया आचरण को देखते हुए आवेदन तुरंत प्रभाव से मंजूर किया।

अदालत ने गुण-दोष पर फैसला नहीं किया

हाईकोर्ट ने यह तय नहीं किया कि दाढ़ी की अनुमति वापस लेना वैध था या नहीं, खान पर सेवानिवृत्ति का दबाव था या नहीं, और वीआरएस की मंजूरी अन्यथा सही थी या नहीं। अदालत ने केवल बीएसएफ की प्रारंभिक आपत्ति पर सुनवाई की कि याचिका गलत क्षेत्राधिकार में दायर हुई है।

अदालत ने पाया कि वीआरएस आवेदन तुरा, मेघालय में दिया गया और चुनौती दिया गया आदेश भी वहीं पारित हुआ। दोनों स्थान जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट की क्षेत्रीय सीमा से बाहर हैं। संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार तभी बनता है जब वाद का कारण पूरी तरह या आंशिक रूप से अदालत की सीमा में पैदा हो। अदालत के अनुसार, विवाद का कोई महत्वपूर्ण या अनिवार्य हिस्सा जम्मू-कश्मीर में नहीं हुआ।

खान की ओर से यह दलील दी गई कि बीएसएफ कश्मीर के महानिरीक्षक को पक्षकार बनाने और महानिदेशक का कार्यालय नई दिल्ली में होने से इस अदालत को क्षेत्राधिकार मिलता है। पीठ ने दोनों दलीलें खारिज कीं। अदालत ने कहा कि कश्मीर के महानिरीक्षक का इस विवाद से कोई संबंध नहीं है और संबंधित पर्यवेक्षी अधिकारी शिलांग के महानिरीक्षक हैं। केवल बल के महानिदेशक का दिल्ली में होना किसी भी हाईकोर्ट को क्षेत्राधिकार नहीं देता।

न्यायमूर्ति ओसवाल ने याचिका क्षेत्राधिकार के अभाव में खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता अपनी शिकायत के निवारण के लिए सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत जा सकते हैं।

अनीता शर्मा

एक संवेदनशील और शांत स्वभाव की महिला हैं। घर-परिवार के बीच रहकर उन्होंने ज़िंदगी के छोटे-छोटे पड़ावों को करीब से देखा है। उन्हें सुबह की सैर, घर के आंगन में बैठकर चाय पीना और पुरानी पत्रिकाएँ पढ़ना पसंद है। वे आसपास के लोगों के सुख-दुख को दिल से महसूस करती हैं। उनकी सोच साफ और सीधी है — जो दिखे, वही कहें, बिना बढ़ा-चढ़ाए।

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