बिना अलग नोटिस ब्लैकलिस्टिंग रद्द, हाईकोर्ट ने कंपनी को दिया जवाब का मौका

पुलिस के 20 टावरों का भुगतान का विवाद
छत्तीसगढ़ संवाददाता
बिलासपुर, 11 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग के लिए संचार टावर लगाने वाली दिल्ली की कंपनी एप्लाइड कम्युनिकेशंस एंड कंट्रोल्स को ब्लैकलिस्ट करने का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसी कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना जरूरी है। कमियों को दूर करने के लिए पत्र जारी करना अपने आप में ब्लैकलिस्टिंग से पहले अलग कारण बताओ नोटिस देने का विकल्प नहीं हो सकता।
मुख्य न्यायाधीश कृष्ण राम महापात्र और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की खंडपीठ ने कंपनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने कंपनी को 30 दिनों के भीतर अपना जवाब पेश करने का निर्देश दिया है। जवाब मिलने के बाद विभाग नियमानुसार आगे की कार्रवाई कर सकेगा।
कंपनी के संचालक शिव कुमार शर्मा के अनुसार, फर्म को पुलिस विभाग के लिए 33 संचार टावर लगाने का ठेका मिला था। कंपनी ने निर्धारित समय में काम पूरा किया, लेकिन भुगतान केवल 13 टावरों का किया गया। शेष 20 टावरों का भुगतान निविदा की शर्तों के अनुरूप काम नहीं होने का हवाला देकर रोक दिया गया। बकाया भुगतान को लेकर दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कार्यवाही भी लंबित है।
कंपनी ने बताया कि 26 फरवरी 2026 को जारी पत्र में कथित कमियों को 15 मार्च तक दूर करने का निर्देश दिया गया था। साथ ही चेतावनी दी गई थी कि ऐसा नहीं करने पर सुरक्षा राशि जब्त कर कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा। इसके बाद 16 जून 2026 को ब्लैकलिस्टिंग का आदेश जारी कर दिया गया।
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि कंपनी को 20 टावरों की कमियां दूर करने का अवसर दिया गया था। विभाग ने 12 अगस्त 2025 के कंपनी के एक पत्र का भी हवाला दिया, जिसमें टावरों का निर्माण निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं होने की बात स्वीकार करते हुए सुधार के लिए समय मांगा गया था।
हाईकोर्ट ने पाया कि कमियां दूर करने के लिए पत्र जारी किए जाने के बाद ब्लैकलिस्टिंग से पहले न तो अलग से कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही कंपनी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला। कंपनी को यह स्पष्ट करने का मौका भी नहीं दिया गया कि किए गए काम का विवरण निविदा की शर्तों के अनुरूप था या नहीं।
कोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन मानते हुए ब्लैकलिस्टिंग का आदेश निरस्त कर दिया। हालांकि, आगे की कार्यवाही में देरी से बचने के लिए कोर्ट ने अपने आदेश को ही कारण बताओ नोटिस मानते हुए कंपनी को 30 दिन में जवाब देने को कहा है। जवाब मिलने के बाद विभाग जरूरत पड़ने पर सुनवाई का अवसर देकर नियमानुसार निर्णय ले सकेगा।



