छत्तीसगढ़

शिक्षक पिता को बेटे की कस्टडी नहीं, हाईकोर्ट बोला- बेहतर शिक्षा का दावा काफी नहीं

छत्तीसगढ़ संवाददाता

बिलासपुर, 5 नवंबर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बाल अभिरक्षा के एक मामले में स्पष्ट किया है कि पिता का शिक्षक होना या बच्चे को बेहतर शिक्षा देने की क्षमता रखना अपने आप में उसकी कस्टडी पाने का आधार नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की खंडपीठ ने पिता की अपील खारिज करते हुए कहा कि बच्चे का हित माता-पिता के अधिकारों से ऊपर है। जब मां के पास बच्चे की देखभाल और शिक्षा में कोई लापरवाही सामने नहीं आई है तो उसे मौजूदा वातावरण से अलग करना उचित नहीं होगा।

मामला बलौदाबाजार जिले का है। तलाक के बाद सात वर्षीय बेटा मां के साथ रह रहा है। पिता ने फैमिली कोर्ट से बच्चे की कस्टडी मांगी थी, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने पर हाईकोर्ट में अपील की।

दंपती का विवाह 28 अप्रैल 2015 को हुआ था। उनके एक बेटा है। आपसी विवाद के बाद पति ने तलाक की प्रक्रिया शुरू की और बच्चा मां के साथ रहने लगा। बाद में पिता ने फैमिली कोर्ट में बेटे की कस्टडी के लिए आवेदन किया।

पिता का कहना था कि वह शिक्षक है और संयुक्त परिवार में रहता है। परिवार के अन्य सदस्य भी बच्चे की देखभाल में सहयोग कर सकते हैं। वह बेटे को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में बेहतर शिक्षा देना चाहता है।

फैमिली कोर्ट में पेश सात वर्षीय बच्चा पिता को देखकर भी उनकी ओर नहीं गया और न ही उनके साथ जाने की इच्छा जताई। अदालत ने पिता की कस्टडी की मांग खारिज कर दी।

मां ने अदालत में कहा कि वह बेटे की पढ़ाई और परवरिश ठीक से कर रही है। उसने आरोप लगाया कि पिता ने बेटे के जन्म के बाद न तो उससे मिलने की कोशिश की और न ही उसे अपने साथ ले जाने का प्रयास किया। मां के मुताबिक पिता ने भरण-पोषण की जिम्मेदारी भी नहीं निभाई और कस्टडी की मांग का उद्देश्य भरण-पोषण से बचना है।

हाईकोर्ट ने पाया कि बच्चा वर्तमान में दूसरी कक्षा में पढ़ रहा है। मां ने स्कूल फीस की रसीदें पेश की थीं, जिससे उसकी पढ़ाई जारी रहने की पुष्टि हुई। जिरह के दौरान पिता ने दूसरी शादी करने की बात भी स्वीकार की।

खंडपीठ ने कहा कि बच्चे की अभिरक्षा तय करते समय माता-पिता के कानूनी अधिकारों की तुलना में बच्चे का कल्याण अधिक महत्वपूर्ण है। यदि बच्चे की शिक्षा, देखभाल और परवरिश उचित तरीके से हो रही है तो केवल पिता की बेहतर आर्थिक स्थिति या शिक्षा देने की अधिक क्षमता के आधार पर कस्टडी नहीं बदली जा सकती।

अदालत ने माना कि बच्चे को उसके मौजूदा वातावरण से हटाने के लिए कोई पर्याप्त आधार नहीं है। इसलिए फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने पिता को बेटे से मिलने का अधिकार दिया है। वह त्योहारों, बच्चे के जन्मदिन और स्कूल की लंबी छुट्टियों के दौरान उससे मिल सकता है।

मुलाकात के लिए पिता को पहले मां को सूचना देनी होगी और समय व स्थान आपसी सहमति से तय करना होगा। मुलाकात किसी सार्वजनिक स्थान पर होगी। अदालत ने मां को भी बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए मुलाकात के अनुरोधों पर सकारात्मक विचार करने की सलाह दी है। हालांकि मुलाकात के लिए कोई निश्चित दिन या समय तय नहीं किया गया है।

अदालत ने कहा कि गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 17 के तहत बच्चे की उम्र, शिक्षा, देखभाल और समग्र कल्याण को ध्यान में रखा जाता है। वहीं हिंदू अल्पसंख्यकता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 13 में भी बच्चे के हित को सर्वोपरि माना गया है।

नील रतन कुंडू बनाम अभिजीत कुंडू मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया था कि बच्चे का कल्याण माता-पिता के कानूनी अधिकारों से ऊपर है। पिता की अधिक आर्थिक क्षमता या बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने का दावा अपने आप में कस्टडी देने के लिए पर्याप्त नहीं है।

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