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सुप्रीम कोर्ट में ‘वंदे मातरम्’ के 6 पदों को गाने के अनिवार्य आदेश को चुनौती, याचिका में बताया गया ‘इस्लाम विरोधी’

फैक्ट चेक (Fact Check): सोशल मीडिया और समाचारों में किया जा रहा यह दावा पूरी तरह सही है। 2 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह पदों (Stanzas) को गाना अनिवार्य किया गया है।

क्या है पूरा मामला?

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस साल की शुरुआत में एक आदेश/सलाह जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि अब सरकारी कार्यक्रमों और औपचारिक आयोजनों में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के मूल 6 पदों को पूरा गाया जाएगा। अब इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। हाल ही में बौद्ध कार्यकर्ता बी.डी. बोरकर द्वारा दायर याचिका में गृह मंत्रालय के इस आदेश को संविधान के खिलाफ बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की गई है।

याचिका में क्या कहा गया है?

सुप्रीम कोर्ट में दायर इस याचिका में सीधे तौर पर कहा गया है कि ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह पदों को गाने की अनिवार्यता “इस्लामोफोबिक” (इस्लाम विरोधी) है। याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें इस प्रकार हैं:

  • धर्मनिरपेक्षता पर सवाल: याचिका में तर्क दिया गया है कि केवल शुरुआती दो पदों की जगह आनंदमठ उपन्यास के पूरे छह पदों वाले संस्करण को अनिवार्य बनाना भारत को एक “धर्मनिरपेक्ष गणराज्य” से “धर्मतंत्र” (Theocracy) में बदलता है।
  • धार्मिक संदर्भ: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि गीत के तीसरे और उसके बाद के पदों में हिंदू देवी-देवताओं (जैसे दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती) का स्पष्ट रूप से आह्वान किया गया है, जो अन्य धर्मों के लोगों की आस्था के खिलाफ हो सकता है।

विवाद का पिछला संदर्भ

यह कोई पहली याचिका नहीं है। इससे पहले प्रसिद्ध गायक टी.एम. कृष्णा ने भी 6 पदों की अनिवार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। संविधान सभा ने मूल रूप से ‘वंदे मातरम्’ के केवल शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया था। दूसरी ओर, सरकार और समर्थकों का तर्क है कि पूरे छह पद गाने का उद्देश्य गीत के मूल काव्यात्मक सार को संरक्षित करना और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इसके ऐतिहासिक महत्व को सम्मान देना है और यह कोई दंडनीय अनिवार्यता नहीं बल्कि एक एडवाइजरी (सलाह) है जिसका सम्मान किया जाना चाहिए।

सुनीता सिंह

एक जिम्मेदार और परिवार-केंद्रित व्यक्तित्व हैं। उन्होंने जीवन में अनुशासन और ईमानदारी को सबसे ऊपर रखा है। पढ़ाई और घर संभालने के साथ-साथ समाज के छोटे कामों में भी रुचि रखती हैं। उन्हें बच्चों से बात करना, त्योहारों की तैयारी और घर की पुरानी यादें संजोना अच्छा लगता है। उनकी भाषा सरल है और सोच स्पष्ट।

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