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यूपीएससी शताब्दी समारोह में पीएम मोदी ने कहा, 1920 में सुभाष चंद्र बोस ने संस्कृत में सिविल सेवा परीक्षा दी

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026 को भारत मंडपम में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 1920 में, जब देश में ब्रिटिश शासन था, सुभाष चंद्र बोस ने सिविल सेवा परीक्षा दी थी और संस्कृत का प्रश्नपत्र भी लिखा था।

प्रधानमंत्री ने समारोह में लगाई गई गैलरी का जिक्र करते हुए कहा कि गैलरी देखते समय उन्हें 1920 के उस दौर की जानकारी मिली, जब सुभाष चंद्र बोस भी इसी प्रक्रिया से गुजरे थे। उन्होंने कहा कि उस समय अंग्रेजों का शासन होने के बावजूद संस्कृत का प्रश्नपत्र हुआ करता था और सुभाष बाबू ने अपनी परीक्षा संस्कृत में दी थी।

यह कार्यक्रम यूपीएससी की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित वर्ष भर के समारोहों का समापन था। आयोग की संस्थागत यात्रा 1 अक्टूबर 1926 को शुरू हुई थी, जब भारत में पहली पब्लिक सर्विस कमीशन का गठन हुआ। स्वतंत्रता के बाद यह संघ लोक सेवा आयोग बना।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने यूपीएससी शताब्दी स्मारक सिक्का, विशेष डाक टिकट और ‘100 लैंडमार्क जजमेंट्स’ शीर्षक की पुस्तक का विमोचन किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि यह केवल संस्था के 100 वर्ष पूरे होने का उत्सव नहीं है, बल्कि उन लाखों युवाओं की आकांक्षाओं और संस्था पर देश के भरोसे का भी उत्सव है। उन्होंने कहा कि इस सदी में पीढ़ियां, सरकारें, तकनीक और पाठ्यक्रम बदले, लेकिन यूपीएससी पर भरोसा कायम रहा।

प्रधानमंत्री ने सरदार वल्लभभाई पटेल को भी याद किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद चुनौती केवल देश को आजाद रखना नहीं, बल्कि उसे चलाना भी थी। राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए जिस ‘स्टील फ्रेम’ की जरूरत थी, वह सरदार पटेल ने दिया और यूपीएससी को स्वतंत्र भारत की एक महत्वपूर्ण संस्था बनाया।

ऐतिहासिक रूप से 1920 की परीक्षा भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) की परीक्षा थी, जो उस समय ब्रिटिश प्रशासन के अधीन लंदन में होती थी। यूपीएससी का गठन इसके छह वर्ष बाद, 1926 में हुआ। सुभाष चंद्र बोस ने इस परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया था और बाद में परिवीक्षा के दौरान 1921 में सेवा छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। संस्कृत उस परीक्षा के विषयों में शामिल था। प्रधानमंत्री के बयान में भी संस्कृत के प्रश्नपत्र और बोस द्वारा परीक्षा संस्कृत में लिखे जाने का उल्लेख है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि 1926 में जब संस्था की नींव रखी गई, तब प्राथमिकताएं अलग थीं। स्वतंत्रता के बाद इसका ध्यान आजाद भारत के सपनों को पूरा करने पर केंद्रित हुआ। उन्होंने कहा कि संस्था ने अपनी जिम्मेदारियां निभाई हैं और अब अगले 25 वर्षों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना होगा।

अजय यादव

एक सीधे-सादे स्वभाव के व्यक्ति हैं। बचपन से ही अपने आसपास की बातों को याद रखने की आदत रही। परिवार में बड़ों का आदर और मेहनत की सीख मिली। वे सड़कों पर घूमना, बस-स्टैंड और बाजार की हलचल देखना पसंद करते हैं। उन्हें लगता है कि असली तस्वीर वही है जो आम दिन में दिखती है, किसी मंच पर नहीं।

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