छत्तीसगढ़

राहुल गांधी का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च, क्या हैं इस राजनीति के मायने?

-दुष्यंत कुमार

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत से मिलने का समय मांगा था. लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने मुलाक़ात से इनकार कर दिया.

राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर कहा कि वे उनसे मिलकर चुनाव आयोग और कथित वोट चोरी समेत कई मुद्दों पर अपनी चिंताएं उनके सामने रखना चाहते हैं.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जिन मुद्दों को लेकर मुलाक़ात का अनुरोध किया गया है, उनसे जुड़े मामले पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं. ऐसे मामलों पर अलग से बैठक करना न्यायिक मर्यादा के अनुकूल नहीं होगा.

तो सवाल यह है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता का मुख्य न्यायाधीश से मिलने का समय मांगना क्या एक सामान्य संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा था या इसे राजनीतिक क़दम के तौर पर देखा जाना चाहिए?

क़ानून क्या कहता है?

वरिष्ठ क़ानूनी विश्लेषक फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, मुलाक़ात का समय मांगने के बाद विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपने वीडियो में कहा कि हम किसी राजनीतिक पार्टी की हैसियत से नहीं, बल्कि नागरिक के तौर पर मिलेंगे. इसके बावजूद मुख्य न्यायाधीश ने जिन बातों को आधार मानकर मिलने से इनकार किया है, वह फ़ैसला बिल्कुल सही है.

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ज़ोर देकर कहते हैं कि एसआईआर का मामला इस समय मुख्य न्यायाधीश की बेंच के सामने है.

वह कहते हैं, दिल्ली में हुई हिंसा, पुलिस के बल प्रयोग या अदालत की अवमानना से जुड़े मामलों पर आज (12 अक्तूबर) सुनवाई होनी है. ऐसे में एसआईआर से जुड़े इन मामलों में मुख्य न्यायाधीश का किसी भी राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल से मिलना ठीक नहीं है.

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा इस मामले को एक उदाहरण से समझाते हैं.

वह कहते हैं, अगर 140 करोड़ लोग भी सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करें और किसी एक व्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन हो रहा हो तो सुप्रीम कोर्ट को यह नहीं देखना चाहिए कि संख्या बल किस तरफ़ है.

क्या मुलाक़ात का समय मांगना राजनीतिक क़दम था?
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विजय त्रिवेदी इसे पूरी तरह राजनीतिक क़दम मानते हैं.

वह कहते हैं, राहुल गांधी राजनीतिक तौर पर अपने आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं. उनका मुख्य न्यायाधीश से मिलने का समय मांगना निश्चित रूप से राजनीतिक क़दम है. ऐसा करके वह हर दिन इस आंदोलन को चर्चा में रखना चाहते हैं.

विजय त्रिवेदी कहते हैं, दूसरी तरफ़, मुख्य न्यायाधीश इस तरह किसी से नहीं मिलते. न्यायपालिका का काम है कि उसके सामने जो मुद्दा आए, उस पर वह संवैधानिक दायरे में रहकर सुनवाई करे. मुख्य न्यायाधीश के सामने अपनी बात रखने का रास्ता केवल याचिका के ज़रिए है.

वह कहते हैं, हमें इस फ़र्क़ को साफ़ तौर पर समझना चाहिए. मुख्य न्यायाधीश जनप्रतिनिधि नहीं हैं.

वरिष्ठ क़ानूनी विश्लेषक

इस बारे में बात करते हुए वरिष्ठ क़ानूनी विश्लेषक फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि निश्चित रूप से पहले कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो नहीं होनी चाहिए थीं.

उनके मुताबिक़, इसकी शुरुआत साल 2018 में हुई, जब तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर एक में ले गए थे. लोगों ने इसे अच्छी नज़र से नहीं देखा. बाद में जब रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया तो इसे और विवादास्पद माना गया.

इस बीच, वह एक दूसरी घटना का भी ज़िक्र करते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 सितंबर 2024, बुधवार की शाम तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के दिल्ली स्थित आवास पर गणपति पूजा में शामिल हुए थे.

आज के संदर्भ में फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, यह कहना पूरी तरह सही नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के साथ है, लेकिन कई फ़ैसले इस तरफ़ इशारा करते हैं.

वह कहते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के घर जाना और उसका वीडियो सार्वजनिक किया जाना सही नहीं था. वह वीडियो सार्वजनिक नहीं होना चाहिए था, क्योंकि इससे लोगों के मन में संदेह पैदा होता है.

क्या यह क़दम कांग्रेस के लिए ग़लत साबित हुआ?
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी इस सवाल को मिले-जुले रूप में देखते हैं. वह कहते हैं कि इसके तीन पक्ष हैं.

वह कहते हैं, पहला पक्ष सुप्रीम कोर्ट और भारत के मुख्य न्यायाधीश का है, जो केवल क़ानून के दायरे में रहकर अपना फ़र्ज़ निभा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई कर सकता है, लेकिन वह भी अदालत और क़ानून के दायरे में ही होगा.

दूसरा पक्ष कांग्रेस का है. राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी दल ऐसी कोशिशों के ज़रिए इस आंदोलन को जीवित रखना चाहते हैं. किसी भी आंदोलन का एक हिस्सा यह होता है कि उसकी चर्चा बनी रहे. विपक्षी दल किसी न किसी तरह से यह काम करने की कोशिश कर रहे हैं. कभी कांग्रेस, कभी सीजेपी तो कभी आम आदमी पार्टी हर दिन कुछ न कुछ कर रही है.

तीसरा पक्ष भारतीय जनता पार्टी का है. बीजेपी के अपने सवाल हैं. उसका कहना है कि विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान नहीं कर रहा है. इसके चलते बीजेपी को राहुल गांधी के ख़िलाफ़ यह रणनीति बनाने का मौक़ा मिल गया है कि विपक्ष देश की संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है.

बीजेपी ने इस मुद्दे पर क्या कहा?
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने 12 अक्तूबर को हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की आलोचना की.

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को रोज़मर्रा की राजनीतिक लड़ाइयों से अलग रखा जाना चाहिए. उन्होंने राहुल गांधी पर संवैधानिक सिद्धांतों और राजनीतिक गतिविधियों को आपस में मिलाने का आरोप लगाया.

बीजेपी नेता निशिकांत दुबे ने शाम सात बजे एक्स पर लिखा, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य चुनाव आयुक्त के बाद अब महाराजा राहुल गांधी जी ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का भी इस्तीफ़ा मांग लिया. सूत्रों के अनुसार इस इस्तीफ़े के बाद राहुल गांधी जी प्रधानमंत्री, शरजील इमाम राष्ट्रपति, अभिजीत दीपके उपराष्ट्रपति, प्रियंका गांधी जी सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश तथा ख़ालिस्तानी पन्नू मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए जाएंगे. सोरोस अमेरिका में भारत के राजदूत होंगे.

विपक्ष के दूसरे नेताओं ने क्या कहा?
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने मुख्य न्यायाधीश के मुलाक़ात से इनकार करने के फ़ैसले की आलोचना की.

राउत ने कहा कि विपक्ष कथित वोट चोरी और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दों पर अपनी चिंताएं मुख्य न्यायाधीश के सामने रखना चाहता था.

उन्होंने कहा कि देश के लोग मुख्य न्यायाधीश के इस फ़ैसले को याद रखेंगे.

राहुल गांधी और खड़गे ने मुख्य न्यायाधीश से मिलने का समय कब मांगा था?

इससे पहले, नौ अक्तूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाक़ात के बाद राहुल गांधी ने कहा था कि विपक्ष सोमवार को सुप्रीम कोर्ट जाएगा और मुख्य न्यायाधीश को एक ज्ञापन सौंपेगा.

इससे पहले विपक्षी दलों के नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ अपनी मांगों को लेकर संसद से विजय चौक तक मार्च किया था और राष्ट्रपति को एक ज्ञापन सौंपा था.

इसके अगले दिन, यानी 10 अक्तूबर को राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर 12 अक्तूबर को शाम चार से पांच बजे के बीच मुलाक़ात का समय मांगा.

मुख्य न्यायाधीश के जवाबी पत्र के मुताबिक़, विपक्ष के दोनों नेता मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों, कई छात्रों की कथित मनमानी गिरफ़्तारियों, मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने और ट्रेनें रद्द होने समेत अन्य मामलों पर ज्ञापन देना चाहते थे.

कांग्रेस ने क्या कहा?
11 अक्तूबर को बेंगलुरु में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य न्यायाधीश से मिलने के अनुरोध की जानकारी दी.

उन्होंने कहा कि वह और राहुल गांधी मुख्य न्यायाधीश के सामने देश की स्थिति रखेंगे.

खड़गे ने कहा कि वे मुख्य न्यायाधीश से कोई मांग नहीं कर सकते, केवल अनुरोध कर सकते हैं.

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर देश में अव्यवस्था पैदा करने का आरोप लगाया.

खड़गे ने यह भी आरोप लगाया कि देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति है और सरकार युवाओं के आंदोलन से डरी हुई है

मुख्य न्यायाधीश ने पत्र में क्या जवाब दिया?
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के पत्र का लिखित जवाब दिया.

इसमें उन्होंने कहा कि जिन मुद्दों पर बातचीत के लिए समय मांगा गया है, वे पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं.

उनके मुताबिक़, लंबित मामलों पर इस तरह की बैठक करना संविधान के बुनियादी ढांचे से जुड़े शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत और स्थापित न्यायिक मर्यादा के अनुकूल नहीं होगा.

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के पास पत्र में उठाए गए मुद्दों को प्रशासनिक स्तर पर हल करने का अधिकार नहीं है.

हालांकि, उन्होंने कहा कि नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मामलों पर अदालत अपनी न्यायिक शक्तियों के तहत विचार कर सकती है.

मुख्य न्यायाधीश ने विपक्षी नेताओं को अपनी चिंताएं औपचारिक याचिका के ज़रिए अदालत के सामने रखने का रास्ता बताया.

12 अक्तूबर को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्थापना दिवस से जुड़े एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बातचीत में भी जस्टिस सूर्यकांत ने मुलाक़ात का अनुरोध मिलने और उसका जवाब देने की पुष्टि की.

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े सभी नागरिकों के लिए खुले हैं और हर नागरिक को अदालत जाने का अधिकार है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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केरल: ज्ञानेश कुमार को हटाने के प्रस्ताव को सीएम सतीशन ने बताया ऐतिहासिक, बीजेपी ने कहा शर्मनाक
इमरान क़ुरैशी

केरल विधानसभा ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव लगभग सर्वसम्मति से पारित किया है. ऐसा करने वाली यह देश की पहली विधायी संस्था बन गई है.

ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं.

कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ़) के नेता और मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने यह प्रस्ताव पेश किया. विपक्षी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) ने भी इसका समर्थन किया.

विधानसभा में मौजूद बीजेपी के तीन सदस्यों में से दो विधायकों ने प्रस्ताव का विरोध किया. 140 सदस्यों वाली विधानसभा में यूडीएफ़ के 102 और एलडीएफ़ के 35 विधायक हैं.

प्रस्ताव में कहा गया, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह जताए जाने के मौजूदा हालात में संस्था की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए क़दम उठाना ज़रूरी है.

केरल बीजेपी ने इस प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की है. पार्टी ने एक्स अकाउंट पर लिखा, हम सभी एसईआर प्रक्रिया से गुजरे हैं. बीएलओ हमारे घरों पर आए थे. अब जो रहा है, वह ईमानदारी से काम करने वाले लाखों बीएलओ के अपमान के समान है.

ऐतिहासिक प्रस्ताव

प्रस्ताव में केंद्र सरकार से मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन के लिए गठित समिति के ढांचे में बदलाव करने की मांग भी की गई.

इसमें केंद्रीय गृह मंत्री की जगह भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की बात कही गई. प्रस्ताव में कहा गया है कि इस समिति में प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता भी शामिल होने चाहिए.

प्रस्ताव में केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा गया, केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन वाली समिति को ऐसी समिति में बदलकर चुनाव आयोग की संस्था के रूप में विश्वसनीयता भी खत्म कर दी, जिसमें उसका बहुमत था.

सतीशन ने एक्स पर लिखा, हमारी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता. मतदाता सूची में संशोधन, पात्र मतदाताओं को मतदान के अधिकार से वंचित किए जाने और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर उठी गंभीर चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

सतीशन ने अपनी पोस्ट में यह भी कहा, इस ऐतिहासिक प्रस्ताव के जरिए केरल ने तीन स्पष्ट मांगें रखी हैं.

सतीशन की तीन मांगें हैं – मतदान का अधिकार बहाल किया जाए, मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जाए और चयन प्रक्रिया में सुधार हो.

उन्होंने कहा, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में हुई अनियमितताओं को दूर किया जाए और गलत तरीके से मतदाता सूची से बाहर किए गए सभी पात्र मतदाताओं के मतदान के अधिकार तुरंत बहाल किए जाएं. मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाए, जिनकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठे हैं.

सतीशन ने कहा, मतदान का अधिकार हमारे लोकतंत्र की नींव है. किसी भी संस्था को हमारे नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. हमारा रुख स्पष्ट है. मतदान के अधिकार की रक्षा होनी चाहिए. संविधान का पालन होना चाहिए. लोकतंत्र की जीत होनी चाहिए. केरल स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के पक्ष में मजबूती से खड़ा है.

प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि स्थिति की गंभीरता उन रिपोर्टों से और बढ़ गई है, जिनमें बताया गया है कि मतदाता सूची तैयार करने वाले इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स की शक्तियां कम कर दी गईं, फॉर्म 6 में संशोधन किए गए और चुनाव आयोग के फैसलों पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी.

प्रस्ताव में कहा गया, मतदाता सूची में ऐसी अनियमितताएं जनता के जनादेश को कमजोर करने के समान हैं.

सीपीएम के दो सदस्यों, साजी चेरियन और एम. विपिन ने प्रस्ताव में संशोधन पेश करने की मांग की. वे केरल की मतदाता सूचियों से 24 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मामले में जवाबदेही तय करना चाहते थे. उन्होंने केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग भी की.

मुख्यमंत्री सतीशन ने उनके प्रस्तावित संशोधनों को खारिज कर दिया. उस समय के मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. रतन यू. केलकर फिलहाल मुख्यमंत्री के सचिव हैं.

हालांकि, मुख्यमंत्री ने विपक्ष के नेता पिनराई विजयन के सुझाव को स्वीकार कर लिया.

विजयन ने कहा था कि प्रस्ताव में इस्तेमाल किए गए वाक्यांश लाखों पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर रखा गया को बदलकर पूरे देश के संदर्भ में करोड़ों मतदाताओं को बाहर रखा गया किया जाना चाहिए.

मुख्यमंत्री ने उत्साहित होकर सोशल मीडिया मंच पर लिखा, केरल ने इतिहास रच दिया है. पहली बार केरल विधानसभा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया है.

उनका यह बयान पूरी तरह गलत नहीं है. देश की किसी भी विधायिका ने इससे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित नहीं किया है.

कुछ महीने पहले विधानसभा चुनाव होने से पहले भी केरल विधानसभा ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में एक प्रस्ताव पारित किया था.

बीजेपी ने क्या कहा?

भारतीय जनता पार्टी ने वीडी सतीशन की पोस्ट का जवाब दिया है.

प्रस्ताव को ऐतिहासिक बताए जाने पर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने एक्स पर लिखा कि ये अभूतपूर्व पाखंड और धोखाधड़ी का शर्मनाक इतिहास है.

उन्होंने कहा कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, तब यह प्रस्ताव पारित किया गया. साथ ही, दूसरी जगहों पर एसआईआर का विरोध किया जाता है, लेकिन केरल में भी एसआईआर के जरिए फर्जी मतदाताओं को हटाया गया.

उन्होंने कहा, मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफा मांगा जा रहा है, लेकिन केरल में एसआईआर की निगरानी करने वाले मुख्य निर्वाचन अधिकारी को वीडी सतीशन का निजी सचिव बनाया गया है.

राजीव चंद्रशेखर ने एक्स पर लिखा, मुख्यमंत्री ने इतिहास रचने के नाम पर सबसे बड़ा काम यह किया है कि पांच में से चार गारंटियां अब भी अधूरी हैं. पुथुयुगा केरलम के सपने का मतलब बिजली कटौती, दवाओं की कमी, बढ़ता कर्ज, रिकॉर्ड बेरोजगारी और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें रहा है. बेशक, यह इतिहास है, सर. लेकिन ऐसा इतिहास जिस पर गर्व करने या जिसका प्रचार करने की जरूरत नहीं है.

ज्ञानेश कुमार से जुड़ा पुराना मामला

यह प्रस्ताव ऐसे समय पारित हुआ है, जब राज्य सरकार दो दशक पहले लोक निर्माण विभाग के सचिव रहते हुए ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ दर्ज सतर्कता जांच रिपोर्ट की दोबारा समीक्षा कर रही है.

राज्य के गृह मंत्री रमेश चेन्नितला ने पिछले सप्ताह बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया था कि उन्होंने इस मामले में कानूनी राय मांगी थी.

उनके मुताबिक, उन्हें बताया गया कि लोक निर्माण विभाग के सचिव रहते हुए ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में 215 करोड़ रुपये की सड़क परियोजना में संज्ञेय अपराध हुआ था.

उन्होंने कहा, इसलिए मैंने सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को जांच का आदेश दिया है.

यह मामला 2006 में सामने आया था, जब एक इंजीनियर मलेशिया लौटने के बाद आत्महत्या कर ली थी. ली सी बीन विश्व बैंक की मदद से चल रही सड़क परियोजना पर काम कर रहे भारत-मलेशिया संयुक्त उपक्रम के मुख्य परियोजना प्रबंधक थे.

अपने सुसाइड नोट में उन्होंने आरोप लगाया था कि संयुक्त उपक्रम की परियोजना में भ्रष्टाचार के चक्र को बनाए रखने के लिए उन पर दबाव डाला जा रहा था, जिससे वह परेशान थे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.(bbc.com/hindi)

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