पूर्व सीजेआई बी.आर. गवई समेत सेवानिवृत्त जजों ने जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की मतदाता सूची टिप्पणी पर जताई आपत्ति

नई दिल्ली, 6 अक्टूबर 2026। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां द्वारा मतदाता सूची से लाखों नाम हटाने और मताधिकार से वंचित करने वाली प्रक्रिया पर दी गई टिप्पणी पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई तथा दिल्ली उच्च न्यायालय के दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि विचाराधीन मामले पर बैठे न्यायाधीश को सार्वजनिक रूप से टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।
जस्टिस भुइयां ने रविवार, 4 अक्टूबर को हैदराबाद की नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में 19वीं जस्टिस बोध राज साहनी स्मृति मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में यह बात कही थी। उन्होंने कहा कि कोई भी प्रक्रिया, जो लाखों भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर उन्हें अपने ही देश में वोट के अधिकार के बिना द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना दे, स्वाभाविक रूप से मनमानी है और संविधानिक व्यवस्था का निषेध है।
उन्होंने कहा कि संविधान दो वर्ग के नागरिकों की कल्पना नहीं करता—एक जिनके पास मतदान का अधिकार हो और दूसरे जिनके पास न हो। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी प्रक्रिया को किसी भी तरह के “व्हाटअबाउटरी” से उचित नहीं ठहराया जा सकता। अनुच्छेद 326 से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। मृत मतदाता को छोड़कर, सूची में दर्ज नाम बिना नोटिस और सुनवाई के अवसर के नहीं हटाया जा सकता। कई रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने चुनाव आयोग या विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का नाम सीधे नहीं लिया, लेकिन टिप्पणी SIR को लेकर चल रहे विवाद और सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाओं के बीच आई।
पूर्व सीजेआई गवई ने क्या कहा
सोमवार को पीटीआई से बातचीत में पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने कहा कि न्यायिक मर्यादा किसी बैठे न्यायाधीश को ऐसे मामले पर टिप्पणी की अनुमति नहीं देती, जो उसी अदालत के समक्ष विचाराधीन हो। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को उस मुद्दे पर सार्वजनिक बयान नहीं देना चाहिए, जिस पर उसी न्यायालय में सुनवाई बाकी है।
सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की आपत्ति
दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एस.एन. ढींगरा और आर.एस. सोढ़ी ने भी टिप्पणी पर सवाल उठाए। जस्टिस ढींगरा ने कहा कि बयान बैठे शीर्ष अदालत के न्यायाधीश की सीमा से बाहर है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक कार्यक्रम में, जब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित हो, ऐसी टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए थी। उनके अनुसार जस्टिस भुइयां को बयान देने से पहले हजार बार सोचना चाहिए था, और उनके पास मामले के पूरे तथ्य नहीं थे।
जस्टिस सोढ़ी ने “मताधिकार से वंचित करना” वाली व्याख्या पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि वोट का अधिकार कानून से तय होता है। जो व्यक्ति कानून की शर्तें पूरी करता है, उसे मतदान का अधिकार है। गलत तरीके से सूची में शामिल नाम को नियत प्रक्रिया से हटाया जा सकता है।
SIR से जुड़े फैसलों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना कदम उठाने के आरोपों के संदर्भ में जस्टिस ढींगरा ने कहा कि यदि असहमति थी, तो चुनाव आयुक्त स्वयं अपनी बात रख सकते हैं।
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण और नाम हटाने को चुनौती देने वाली याचिकाएं इस समय सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। जस्टिस भुइयां की टिप्पणी और पूर्व न्यायाधीशों की आपत्ति उसी पृष्ठभूमि में सामने आई है।



