उत्तराखंड राज्यसभा: बीजेपी ने दिनेश आर्य को उम्मीदवार बनाया, 16 अक्टूबर को होगा मतदान

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तराखंड की राज्यसभा सीट के लिए नैनीताल के संगठनात्मक नेता दिनेश आर्य को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति ने रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को यह नाम मंजूर किया। मतदान 16 अक्टूबर को होना है। यह सीट भाजपा सांसद नरेश बंसल के कार्यकाल पूरा होने से खाली हो रही है। उनका कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त होगा।
आर्य अनुसूचित जाति समाज से हैं और कुमाऊं के नैनीताल-हल्द्वानी क्षेत्र से जुड़े नेता माने जाते हैं। फिलहाल वे उत्तराखंड राज्य स्तरीय पेयजल अनुश्रवण परिषद के उपाध्यक्ष हैं और उन्हें राज्यमंत्री स्तर का दर्जा मिला हुआ है। इससे पहले वे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के जनसंपर्क अधिकारी भी रह चुके हैं। विधानसभा में भाजपा के बहुमत को देखते हुए उनका निर्वाचन लगभग तय माना जा रहा है।
चुनाव कार्यक्रम
निर्वाचन आयोग ने इस सीट के लिए अधिसूचना 29 सितंबर को जारी की थी। नामांकन की अंतिम तिथि 6 अक्टूबर, नामांकन पत्रों की जांच 7 अक्टूबर और नाम वापसी की अंतिम तिथि 9 अक्टूबर है। मतदान 16 अक्टूबर को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा। मतगणना उसी दिन शाम 5 बजे से शुरू होगी। राज्य की कोर कमेटी ने करीब दो दर्जन नामों पर चर्चा के बाद केंद्र को 15 नामों का पैनल भेजा था। अंतिम फैसला केंद्रीय चुनाव समिति ने किया।
कौन हैं दिनेश आर्य
दिनेश आर्य की राजनीतिक शुरुआत छात्र संगठन से हुई। प्रकाशित विवरणों के अनुसार उन्होंने 1985 में नैनीताल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ाव किया और इससे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षण शिविरों में भी हिस्सा लिया। बाद में वे भाजपा युवा मोर्चा और अनुसूचित जाति मोर्चा में सक्रिय रहे। वे 2007 से 2010 तक भाजपा के नैनीताल जिलाध्यक्ष रहे। 2017 में उन्हें भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया और इस दौरान पंजाब की संगठनात्मक जिम्मेदारी भी मिली। यह दायित्व वे 2021 तक संभालते रहे।
धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद आर्य को उनके जनसंपर्क अधिकारी की जिम्मेदारी दी गई। 2023 में उन्हें पेयजल अनुश्रवण परिषद का उपाध्यक्ष बनाया गया। यानी उनका प्रोफाइल मुख्य रूप से संगठन और सरकारी नियुक्तियों का रहा है, न कि विधानसभा या लोकसभा की चुनी हुई सीट का।
2022 में टिकट नहीं मिला था
2022 के विधानसभा चुनाव में आर्य ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित नैनीताल सीट से भाजपा टिकट की दावेदारी की थी। पार्टी ने उस बार सरिता आर्य को उम्मीदवार बनाया। टिकट नहीं मिलने के बाद दिनेश आर्य के निर्दलीय चुनाव लड़ने की चर्चा हुई, लेकिन उन्होंने पार्टी के खिलाफ मैदान में नहीं उतरे। चार वर्ष बाद उसी संगठन ने उन्हें राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है।
कुमाऊं और सामाजिक समीकरण
इस चयन को क्षेत्रीय संतुलन से भी जोड़ा जा रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, उत्तराखंड के मौजूदा तीनों भाजपा राज्यसभा सदस्य गढ़वाल क्षेत्र से हैं। आर्य नैनीताल-हल्द्वानी की राजनीतिक जमीन से आते हैं। ऐसे में उनकी उम्मीदवारी को कुमाऊं को प्रतिनिधित्व देने के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। साथ ही वे अनुसूचित जाति समाज से हैं, इसलिए इस फैसले को दलित प्रतिनिधित्व से भी जोड़कर पढ़ा जा रहा है।
अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की कोशिश में है। ऐसे में राज्यसभा टिकट को आगामी चुनाव की सामाजिक तैयारी के हिस्से के रूप में भी देखा जा रहा है। यह व्याख्या राजनीतिक है। पार्टी ने आधिकारिक रूप से यह नहीं कहा है कि टिकट सिर्फ 2027 के समीकरण को ध्यान में रखकर दिया गया।
हल्द्वानी विवाद के बाद चर्चा
आर्य की उम्मीदवारी की टाइमिंग हल्द्वानी के एक विवाद के कारण भी चर्चा में है। अगस्त 2026 में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद रामलीला मैदान में हवन और गंगाजल छिड़ककर कथित शुद्धिकरण किए जाने का आरोप लगा था। कांग्रेस ने इसे खरगे की दलित पहचान से जोड़कर भाजपा और संघ परिवार पर हमला किया। खरगे ने संसद के मानसून सत्र में भी यह मुद्दा उठाया। भाजपा ने आयोजन से अपने संबंध होने से इनकार किया था। पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम समेत धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की।
कई रिपोर्टों के अनुसार, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने आर्य की उम्मीदवारी को कांग्रेस के इस नैरेटिव के जवाब के रूप में रखने की कोशिश की। न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, पार्टी ने उम्मीदवारी को केवल हल्द्वानी विवाद का जवाब नहीं बताया है, हालांकि नेता इसे अनुसूचित जाति प्रतिनिधित्व से जोड़ रहे हैं। इसलिए दोनों घटनाओं के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। फैसला उसी कुमाऊं क्षेत्र के अनुसूचित जाति नेता के नाम पर हुआ है, जहां यह विवाद उठा था। इसी आधार पर विपक्ष के दलित सम्मान वाले आरोप की राजनीतिक काट तलाशने की चर्चा हो रही है।
बड़े नामों के बीच संगठन का चेहरा
स्टेट्समैन और डेक्कन क्रॉनिकल ने इस चयन को संगठन के लिए अप्रत्याशित बताया है। राज्य नेतृत्व की ओर से भेजे पैनल में कई चर्चित नाम थे। अंत में केंद्रीय नेतृत्व ने ऐसे नेता को चुना, जिनकी सार्वजनिक पहचान मीडिया सुर्खियों से ज्यादा जिलाध्यक्ष, अनुसूचित जाति मोर्चा और मुख्यमंत्री कार्यालय की जिम्मेदारियों तक सीमित रही। कुछ पर्यवेक्षक इसे धामी के करीबी कार्यकर्ता को आगे बढ़ाने के संकेत के रूप में भी पढ़ रहे हैं।
एक टिकट से तीन बातें एक साथ सामने आ रही हैं। पहली, अनुसूचित जाति समाज को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व। दूसरी, कुमाऊं क्षेत्र से चेहरा। तीसरी, लंबे समय तक संगठन में काम करने वाले कार्यकर्ता के लिए संसद का रास्ता। इन तीनों की राजनीतिक परीक्षा 16 अक्टूबर के मतदान में नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव में होगी।



