आईआईटी दिल्ली के डोगरा हॉल में आचार्य प्रशांत का संवाद, करियर और सीजीपीए से लेकर जीवन के उद्देश्य तक उठे सवाल

नई दिल्ली: 29 सितंबर 2026 की दोपहर आईआईटी दिल्ली के डोगरा हॉल में लेखक और दार्शनिक आचार्य प्रशांत ने छात्रों से करीब साढ़े तीन घंटे का संवाद किया। चर्चा करियर, सीजीपीए, प्लेसमेंट पैकेज, असंतोष और जीवन के उद्देश्य पर केंद्रित रही। हॉल में आईआईटी दिल्ली के साथ आईआईटी मद्रास और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र भी मौजूद थे।
आचार्य प्रशांत आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र हैं। मंच पर उनके साथ आईआईटी दिल्ली के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस भूपिंदर गोदारा भी थे। प्रोफेसर गोदारा स्वयं आईआईटी दिल्ली के पूर्व छात्र हैं और उद्योग में लंबे अनुभव के बाद संस्थान से जुड़े हैं। नवभारत टाइम्स के पत्रकार रवींद्र सिंह इस कार्यक्रम में आमंत्रित अतिथि के रूप में मौजूद थे। उनके अनुसार, यह औपचारिक भाषण नहीं, बल्कि छात्रों के सवालों पर आधारित संवाद था।
सीजीपीए और सफलता की परिभाषा पर सवाल
बातचीत की शुरुआत प्रोफेसर गोदारा के सवाल से हुई। उन्होंने पूछा कि अच्छा सीजीपीए हासिल करने की दौड़ में छात्र अपना संतुलन कैसे बनाए रखें। आचार्य प्रशांत ने जवाब में कहा कि छात्रों को यह तय करना चाहिए कि वे जिन मानकों के पीछे भाग रहे हैं, वे उनके अपने हैं या बाहर से थोपे गए हैं। उनके अनुसार, सीजीपीए पढ़ाई से जुड़ाव का ईमानदार पैमाना हो सकता है, लेकिन यदि ऊंचा स्कोर केवल दूसरों को दिखाने के लिए लाया जाए, तो जीवन लेन-देन बन जाता है। उन्होंने कहा कि भीतर का खालीपन अच्छे अंकों से नहीं भरता।
असंतोष और जीवन की योजना पर छात्रों के सवाल
खुले प्रश्नोत्तर में आईआईटी दिल्ली के रिसर्च स्कॉलर विक्की ने कहा कि ग्रेजुएशन, मास्टर्स, गोल्ड मेडल और पीएचडी के बाद भी असंतोष बना रहता है। आचार्य प्रशांत ने जवाब में जीवन को पूरी तरह नियंत्रित करने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि थोड़ी दूर की योजना समझदारी हो सकती है, लेकिन पूरी जिंदगी का नक्शा बना लेना अहंकार है।
आईआईटी मद्रास की छात्रा सौम्या ने परिवार की पाबंदियों और अपनी आजादी का मुद्दा उठाया। आचार्य प्रशांत ने कहा कि जिस चीज की कीमत पता हो, उसे चुकाने से पीछे हटना कायरता है। दिल्ली विश्वविद्यालय की शिखा ने पूछा कि कहीं ये विचार नया भ्रम तो नहीं बनेंगे। जवाब में उन्होंने कहा कि उनके शब्द नया बोझ डालने के लिए नहीं हैं, बल्कि पुरानी धारणाओं को साफ करने के बाद खुद हट जाने चाहिए।
प्लेसमेंट, ध्यान भटकना और गांधी पर बात
पत्रकार रवींद्र सिंह ने पूछा कि क्या करोड़ों का प्लेसमेंट पैकेज जीवन का अंतिम लक्ष्य है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि ऑफर लेटर जॉइनिंग की गारंटी नहीं देता और पदोन्नति या सुख के साथ डर भी आता है। उनके अनुसार, जीवन का असली लक्ष्य मुक्ति है, जो कुछ नया पाने में नहीं, पुरानी धारणाओं को छोड़ने में है।
सोशल मीडिया और लगातार ध्यान भटकने पर उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया को इंसान ने बनाया है। यदि जीवन में कोई सच्चा संबंध, अच्छी किताब या बड़ा संकल्प हो, तो व्यक्ति स्क्रॉल करना भूल जाता है। अर्थहीन जीवन शून्य की तरह आसपास की हर चीज को खींच लेता है।
गांधी जयंती से ठीक पहले अहिंसा पर सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि असत्य के खिलाफ बगावत ही सत्य है। उनके शब्दों में, अहिंसा का अर्थ अपने भीतर के विवेक को न बेचना है। उन्होंने गांधी की अहिंसा को चापलूसी नहीं, बल्कि अन्याय से मुकाबला करने वाली अहिंसा बताया।
परिसरों में मानसिक स्वास्थ्य का संदर्भ
यह संवाद ऐसे समय में हुआ, जब सितंबर में आईआईटी बॉम्बे में एक छात्र की आत्महत्या के बाद परिसर में विरोध हुआ था। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 23 आईआईटी में 2020-21 से 2024-25 के बीच 45 छात्रों की आत्महत्या दर्ज हुई। इसी अवधि में आठ अन्य अप्राकृतिक मौतें भी हुईं, जिससे कुल संख्या 53 हुई। इन आंकड़ों ने शीर्ष तकनीकी संस्थानों में अकादमिक दबाव, अपेक्षाओं और मानसिक स्वास्थ्य सहायता पर बहस तेज की है।
रवींद्र सिंह के अनुसार, संवाद का जोर तैयार समाधान देने पर नहीं, बल्कि छात्रों को अपनी सफलता की परिभाषा और प्राथमिकताओं पर खुद सवाल करने के लिए प्रेरित करने पर रहा। कार्यक्रम के अंत में हॉल में तालियों के साथ एक गहरी खामोशी भी रही।



