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क्या महिलाओं को साष्टांग दंडवत प्रणाम करने की मनाही है? जानिए इसके पीछे की धार्मिक मान्यता

भारतीय संस्कृति में प्रणाम को सम्मान, श्रद्धा और विनम्रता का प्रतीक माना जाता है। भगवान, गुरु और बड़ों के सामने सिर झुकाकर उनका आशीर्वाद लेना सनातन परंपरा का हिस्सा रहा है। पूजा-पाठ और धार्मिक स्थलों पर अलग-अलग प्रकार से प्रणाम करने की परंपराएं भी देखने को मिलती हैं।

इन्हीं में एक है साष्टांग या दंडवत प्रणाम, जिसमें व्यक्ति भूमि पर लेटकर भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव व्यक्त करता है। हालांकि, मंदिरों में अक्सर देखा जाता है कि पुरुष दंडवत प्रणाम करते हैं, जबकि महिलाएं आमतौर पर इस तरह भूमि पर पूरी तरह लेटकर प्रणाम नहीं करतीं। इसके पीछे धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं से जुड़ी अलग-अलग व्याख्याएं बताई जाती हैं।

क्या होता है साष्टांग प्रणाम?

‘साष्टांग’ शब्द का अर्थ है आठ अंगों के साथ किया जाने वाला प्रणाम। धार्मिक परंपरा में इसे भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव माना जाता है।

एक प्रचलित श्लोक में साष्टांग प्रणाम का वर्णन इस प्रकार किया गया है—

«“पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरसा तथा।
मनसा वाचा दृष्ट्या प्रणामोऽष्टाङ्ग उच्यते॥”»

अर्थात पैर, हाथ, घुटने, छाती, सिर, मन, वाणी और दृष्टि—इन आठ माध्यमों से किया गया प्रणाम अष्टांग नमस्कार कहलाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस मुद्रा में व्यक्ति अपने अहंकार को छोड़कर ईश्वर के सामने पूर्ण समर्पण का भाव रखता है।

महिलाओं के लिए क्यों बताई जाती है अलग परंपरा?

महिलाओं के साष्टांग प्रणाम को लेकर धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। इनमें एक मान्यता यह है कि दंडवत प्रणाम की मुद्रा में शरीर का पेट और वक्षस्थल भूमि से स्पर्श कर सकता है।

कुछ धार्मिक व्याख्याओं में महिला के गर्भ और वक्षस्थल को मातृत्व एवं सृष्टि से जुड़े पवित्र अंगों के रूप में देखा गया है। इसी आधार पर महिलाओं के लिए भूमि पर पूरी तरह लेटकर दंडवत प्रणाम करने के बजाय दूसरी मुद्राओं से प्रणाम करने की परंपरा बताई जाती है।

इस संदर्भ में धर्मसिंधु से संबंधित बताया जाने वाला एक श्लोक भी उद्धृत किया जाता है, हालांकि इसकी व्याख्या और व्यवहारिक परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों और संप्रदायों में भिन्न हो सकती हैं।

महिलाएं किस तरह कर सकती हैं प्रणाम?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महिलाओं के लिए भगवान के सामने प्रणाम करने के कई तरीके बताए जाते हैं। वे घुटनों के बल बैठकर सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर या झुककर भगवान को प्रणाम कर सकती हैं।

इन सभी मुद्राओं में मूल भावना श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण की ही मानी जाती है। यानी धार्मिक दृष्टि से प्रणाम का महत्व केवल शरीर की मुद्रा में नहीं, बल्कि व्यक्ति के मन में मौजूद श्रद्धा और भाव में भी माना जाता है।

प्रणाम में भाव को माना जाता है सबसे महत्वपूर्ण

सनातन परंपरा में भगवान के सामने झुकना केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि अहंकार त्याग और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इसलिए महिलाओं द्वारा दंडवत प्रणाम न करने की परंपरा को भी धार्मिक मान्यताओं के संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए।

अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों, संप्रदायों और क्षेत्रों में प्रणाम की विधि को लेकर भिन्न परंपराएं मिल सकती हैं। ऐसे में इसे सार्वभौमिक धार्मिक नियम के बजाय एक प्रचलित धार्मिक मान्यता और परंपरा के रूप में देखना अधिक उचित है।

अजय यादव

एक सीधे-सादे स्वभाव के व्यक्ति हैं। बचपन से ही अपने आसपास की बातों को याद रखने की आदत रही। परिवार में बड़ों का आदर और मेहनत की सीख मिली। वे सड़कों पर घूमना, बस-स्टैंड और बाजार की हलचल देखना पसंद करते हैं। उन्हें लगता है कि असली तस्वीर वही है जो आम दिन में दिखती है, किसी मंच पर नहीं।

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